राज्य के नाटक और समाज का शोषण

12 मार्च, प्रातःकालीन सत्र

हम पिछले कई दिनों से इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं कि राज्य समाज को धोखा देने के लिए लोकतांत्रिक तरीकों से किस प्रकार की नाटकीयता करता है। हमने यह भी अनुभव किया है कि राज्य के प्रयासों में कुल मिलाकर लगभग पंद्रह ऐसे नाटक होते हैं, जिनसे समाज प्रभावित हो जाता है, भ्रम में पड़ जाता है और राज्य उससे लाभ उठाता है।

राज्य की मुख्य नीति “डिवाइड एंड रूल” की होती है। राज्य समाज को टुकड़ों में बाँटकर स्वयं उसका पंच बन जाता है और उस पर शासन करना चाहता है। साथ ही राज्य समाज को भावनाओं में बहाकर उनसे अपने प्रति समर्पण और त्याग भी करवाता है। ये दोनों ही स्थितियाँ समाज के लिए घातक हैं।

लेकिन पूरा समाज राज्य के इस नाटक को समझ नहीं पाता और वह उसके जाल में फँस जाता है। इसके बाद राज्य लगातार समाज का शोषण करता रहता है, और आश्चर्य की बात यह है कि कई बार उसी शोषण में समाज को सुख का भ्रम भी होने लगता है।

इसका केवल एक ही उपाय है—समाज को केवल शरीफ नहीं, बल्कि समझदार बनाया जाए। यदि समाज के लोग समझदार हो जाएँगे तो वे राज्य के इन नाटकों को भी समझ जाएँगे, विभाजनकारी नीतियों को भी पहचान लेंगे और भावनात्मक जाल को भी समझ सकेंगे। तब समाज राज्य के जाल में फँसने से बच सकेगा।

इसलिए मेरा आप सबसे निवेदन है कि केवल शराफत पर निर्भर न रहें, बल्कि समझदार बनें। इसके लिए सबसे अच्छा तरीका यह है कि जब भी समय मिले, आप माँ संस्थान के कार्यक्रमों में कभी-कभी भाग लें। इसके लिए कहीं आने-जाने की आवश्यकता नहीं है। आप ज़ूम, फेसबुक, व्हाट्सएप या फोन के माध्यम से भी जुड़ सकते हैं।

आप कहीं से भी बैठे-बैठे जुड़कर इस दिशा में संवाद और संपर्क बना सकते हैं।