अविमुक्तेश्वरानंद और शंकराचार्य व्यवस्था पर उठते प्रश्न

मैं कई वर्षों से यह अनुभव कर रहा था कि शंकराचार्य प्रणाली अब हिंदू समाज पर एक प्रकार का बोझ बनती जा रही है। चार शंकराचार्यों में से भी मैं अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को कभी शंकराचार्य मानने के लिए तैयार नहीं हुआ, क्योंकि उनमें मुझे शंकराचार्य के अपेक्षित गुण दिखाई नहीं दिए।

स्वरूपानंद सरस्वती को कई लोग कांग्रेस के निकट मानते थे, लेकिन इसके बावजूद उनमें कुछ ऐसे गुण थे जिन्हें शंकराचार्य के पद के अनुरूप माना जा सकता था। मुझे वे गुण अविमुक्तेश्वरानंद में दिखाई नहीं देते।

हाल ही में उन्होंने जो उत्साह में आकर लखनऊ में हिंदुओं की एक समानांतर बड़ी बैठक आयोजित करने का प्रयास किया, उसकी असफलता के बाद उनकी प्रतिष्ठा को और आघात पहुँचा है। बताया गया कि उन्होंने कई दिनों तक घूम-घूमकर उस बैठक के लिए भीड़ जुटाने का प्रयास किया था और देशभर से लाखों लोगों के आने की उम्मीद व्यक्त की गई थी।

लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी के समर्थन के बावजूद वहाँ हजारों की संख्या भी नहीं पहुँच सकी। यह स्थिति इस रूप में सामने आई कि एक शंकराचार्य की वास्तविक प्रभाव-क्षमता पर प्रश्न उठने लगे।

यह भी कहा जा रहा है कि उस सभा में अप्रत्यक्ष रूप से एक प्रकार का शक्ति परीक्षण था। एक ओर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और कुछ विपक्षी दलों के साथ शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद थे, जबकि दूसरी ओर योगी आदित्यनाथ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग और भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेता खुलकर मैदान में दिखाई दे रहे थे।

ऐसी परिस्थितियों में यह विचार करने की आवश्यकता महसूस होती है कि शंकराचार्य और उन्हें मानने वाले लोगों को निकट भविष्य में नई सामाजिक व्यवस्था और भूमिका पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। बहुत से लोगों का मानना है कि आज का हिंदू समाज उन राजनेताओं के नेतृत्व में खड़ा होने के लिए तैयार नहीं है जिन्हें वह मुस्लिम समर्थक मानता है।