सत्ता की विरासत: संघर्षों की असली जड़

4 अप्रैल प्रातःकालीन सत्र

कल मैंने संपत्ति की विरासत को एक बड़ी समस्या के रूप में बताया था, लेकिन इस विरासत की तुलना में सत्ता की विरासत कई गुना ज्यादा समस्याएं पैदा कर रही है।

जिस तरह भारत में हम हजारों वर्षों से देख रहे हैं, उस आधार पर अधिकांश लड़ाइयां सत्ता की विरासत के आधार पर ही हुई हैं। रामायण काल में दशरथ की मृत्यु अथवा महाभारत काल में पांडव-कौरव की लड़ाई इसका स्पष्ट उदाहरण है।

हजरत मोहम्मद के निधन के बाद शिया-सुन्नी के बीच आज तक चल रहा विवाद भी इसी धार्मिक विरासत का झगड़ा है।

आज तक सभी राजनीतिक दलों में यह झगड़ा निरंतर बना हुआ है—चाहे वह नेहरू परिवार हो, लालू प्रसाद का परिवार हो, मुलायम सिंह का परिवार हो अथवा नीतीश कुमार का—किसी भी परिवार में राजनीतिक सत्ता की विरासत विवाद पैदा कर ही रही है।

कई परिवारों में तो पति-पत्नी के बीच भी टकराव हो रहे हैं। जबकि आदर्श स्थिति यह होती है कि सत्ता जनता की अमानत होनी चाहिए, न कि किसी व्यक्ति या परिवार की निजी उपलब्धता।

जनता जिसे चाहे अपनी अमानत सौंप सकती है और जब चाहे वापस ले सकती है। लेकिन अब तक, चाहे वह राजसत्ता हो या लोकतंत्र, कहीं भी राजनीतिक सत्ता को वास्तव में जनता की अमानत नहीं माना जाता है।

अब नई सामाजिक व्यवस्था में हम इस विषय में महत्वपूर्ण बदलाव करने जा रहे हैं। अब राजनीतिक सत्ता किसी व्यक्ति या परिवार का अधिकार नहीं, बल्कि वह समाज का अधिकार मानी जाएगी।