युवा बनाम वृद्ध: नीतिगत विभाजन या सामाजिक वास्तविकता?
10 अप्रैल प्रातःकालीन सत्र: समान नागरिक संहिता पर चर्चा।
समाज में राज्य अक्सर युवा और वृद्ध के बीच भी टकराव उत्पन्न करता रहता है। दोनों को अलग-अलग वर्ग मान लिया जाता है। यह कहना कि यह समाज के भीतर स्वाभाविक भेदभाव है, सही नहीं; यह राज्य की नीतियों का परिणाम अधिक प्रतीत होता है।
युवा सशक्तिकरण राज्य का एक प्रमुख नारा है। एक तरफ राज्य युवा सशक्तिकरण की बात करता है, दूसरी तरफ वृद्ध लोगों की सहायता की भी बात करता है। यह बात जगजाहिर है कि न सभी युवा सही होते हैं और न सभी वृद्ध गलत होते हैं। इसलिए केवल “युवा सशक्तिकरण” की बात करना एकतरफा दृष्टिकोण हो सकता है।
लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में इस विचार का सीधा विरोध करके सफल होना कठिन है। इसलिए मेरा यह सुझाव है कि यदि समान नागरिक संहिता लागू हो जाए और इस कार्य की शुरुआत भारत से हो, तो युवा-वृद्ध के बीच का यह टकराव भी कम हो सकता है।
प्राचीन समय में परिवार के भीतर कौन अधिक सशक्त होगा, यह परिवार तय करता था, न कि कानून। वर्तमान समय में लगभग हर मामले में कानून का हस्तक्षेप बढ़ गया है।
इसलिए हमें युवा सशक्तिकरण या वृद्ध सशक्तिकरण जैसे विभाजनकारी नारों से दूरी बनानी चाहिए और सबको एकजुट होकर समान नागरिक संहिता की मांग करनी चाहिए, ताकि समाज में भेदभाव उत्पन्न करने वाले सभी प्रकार के कानून समाप्त किए जा सकें।
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