न्यायिक सक्रियता बनाम संवैधानिक मर्यादा: लोकतंत्र के लिए चुनौतियाँ

भारत के अनेक उच्च शिक्षित संस्थानों के प्रमुख लोगों ने राष्ट्रपति को संयुक्त रूप से एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने यह आग्रह किया है कि न्यायपालिका की अनावश्यक टिप्पणियों पर गंभीरता से विचार किया जाए। न्यायपालिका ने किसी पुस्तक में न्यायिक भ्रष्टाचार की चर्चा के मामले में जिन कठोर शब्दों का उपयोग किया, उस पर हमारे देश के इन विद्वानों को आपत्ति है।

मैं भी समझता हूँ कि न्यायपालिका ने इस मामले में एक सीमा पार करते हुए कटु टिप्पणियाँ की हैं, जो उचित नहीं थीं। मैंने यह भी सुना है कि सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीशों ने किसी विषय पर चर्चा करते समय यह प्रश्न उठाया कि यदि विधायिका अपना कार्य समय से न करे, तो क्या न्यायपालिका भी चुप बैठी रहे? क्या न्यायपालिका उस कार्य को न करे?

सोचिए, यह कितना बचकाना प्रश्न है। यदि यही प्रश्न राष्ट्रपति पूछें कि यदि न्यायपालिका अपना कार्य समय से न करे या गलती कर दे, तो क्या विधायिका या कार्यपालिका उस कार्य को न करें?

मेरे विचार से, जिस प्रकार कार्यपालिका और विधायिका की अपनी-अपनी सीमाएँ हैं, उसी प्रकार न्यायपालिका की भी अपनी सीमाएँ हैं। न्यायपालिका को यह विचार करना चाहिए कि यदि विधायिका अपना कार्य न करे, तो उस पर सक्रिय होना न्यायपालिका का अधिकार नहीं है, क्योंकि वह अधिकार आम जनता के पास सुरक्षित है।

मेरे विचार से न्यायपालिका को अपनी सीमाएँ समझनी चाहिए। न्यायपालिका जिस प्रकार समाज को भयभीत करने का प्रयास कर रही है, वह उसके लिए ही घातक सिद्ध हो सकता है।