नकली गांधीवाद बनाम वास्तविक गांधीवाद: एक वैचारिक संघर्ष

भारत में कुछ ऐसे नकली गांधीवादी पैदा हो गए हैं, जो अपने को गांधीवादी तो बताते हैं, लेकिन वास्तव में वे या तो कम्युनिस्ट हैं या नेहरू परिवार के भक्त हैं। ये गांधीवादी दिन-रात संपत्ति और पद की लड़ाई लड़ते रहते हैं। इन्हें न समाज की चिंता है, न देश की; इन्हें चिंता है केवल अपने पद की। ये आपस में गुट बनाकर भी दिन-रात एक-दूसरे के खिलाफ प्रचार करते रहते हैं।

इन लोगों की कुछ विशेषताएँ भी हैं—ये हमेशा संघ और नरेंद्र मोदी के विरुद्ध बोलते रहते हैं; दिन भर इनके पास और कोई काम नहीं होता। ये नकली गांधीवादी जल, जंगल, जमीन पर आदिवासियों का पूरा अधिकार बताते हैं। वे इस तरह का प्रचार करते हैं कि जल, जंगल, जमीन सब आदिवासियों की है, उसमें शेष भारत का कुछ नहीं है।

ये लोग यह भी प्रचार करते हैं कि ग्राम सभाएँ सर्वाधिकार-संपन्न इकाई हैं, ग्राम सभा के ऊपर कोई नहीं होता, जबकि ग्राम सभा के ऊपर जिला सभा और सबसे ऊपर राष्ट्र सभा भी होती है। ये नकली गांधीवादी हमेशा नक्सलवाद का समर्थन करते हैं, सांप्रदायिक मुसलमानों का समर्थन करते हैं, विदेशी मुसलमानों का समर्थन करते हैं, और संघ-हिंदुत्व का विरोध करते हैं।

इसी कारण आज ऐसी स्थिति आ गई है कि बहुत से वास्तविक गांधीवादी भी अपने को गांधीवादी कहने में हिचकिचाते हैं, भले ही वे पूरी तरह गांधी के मार्ग पर चलते हों। यह हमारा सौभाग्य है कि वर्तमान समय में संघ और नरेंद्र मोदी गांधी की लाइन पर चल रहे हैं, और वास्तविक गांधीवादियों को उनका समर्थन करना चाहिए।