बंगाल चुनाव के बाद भारतीय मुसलमानों की भूमिका और राष्ट्रीय दृष्टिकोण

बंगाल के मुख्यमंत्री ने परसों बयान दिया था कि “हमें जिन लोगों ने वोट दिया है, हम उन हिंदुओं के साथ खड़े रहेंगे।” यह बयान पूरी तरह गलत था। यह किसी पार्टी का बयान हो सकता है, लेकिन संभावित मुख्यमंत्री का नहीं।

लेकिन आज मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद उन्होंने जो बयान दिया है, वह बहुत स्वागत योग्य है। उन्होंने कहा है कि “हम किसी भी धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेंगे। हम प्रत्येक व्यक्ति को समान मानेंगे।” मैं उनके इस बयान से सहमत हूँ।

मेरे विचार से भारत के मुसलमानों को बंगाल के चुनाव के बाद इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि वे भारतीय मुसलमान बनकर भारत में रहना चाहते हैं अथवा विदेशी मुसलमान के रूप में। हम भारत में मुसलमानों को मेहमान के तौर पर नहीं रख सकते, भाई के तौर पर रख सकते हैं। और यदि भारत का मुसलमान मेहमान के तौर पर रहना चाहता है, तो उसे तुरंत देश छोड़ देना चाहिए।

हम बराबरी के आधार पर ही साथ रह सकते हैं, विशेष अधिकार नहीं दे सकते। भारत का मुसलमान यदि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों से अपना मोह समाप्त नहीं करेगा, तो वह भारत में भाई के समान विश्वास प्राप्त नहीं कर सकेगा।

इसलिए अब भारत के मुसलमानों को इस बात पर गंभीरता से सोचना चाहिए कि उन्हें वंदे मातरम् से परहेज नहीं होना चाहिए और समान नागरिक संहिता से भी परहेज नहीं होना चाहिए। वे अपनी धार्मिक प्रथाओं को मानने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन हम किसी को अलग संगठन बनाने की अनुमति नहीं देंगे।

मेरे विचार से भारत के मुसलमानों को बढ़-चढ़कर कॉमन सिविल कोड का समर्थन करना चाहिए। कॉमन सिविल कोड का समर्थन ही हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की दूरी को घटा सकता है। यदि विशेष अधिकारों की मांग लगातार जारी रहेगी, तो भविष्य और अधिक खराब हो सकता है।