भरत तिवारी प्रकरण और न्याय व्यवस्था के जटिल प्रश्न

आज दिन भर दो-तीन सत्रों में हम भरत तिवारी हत्याकांड पर विस्तार से विचार-मंथन करेंगे। बिहार के किसी जिले में भरत तिवारी नामक एक व्यक्ति की पुलिस वाले नकली मुठभेड़ में मार देते हैं। यह बात सही है कि भरत तिवारी एक मुठभेड़ में मारे गए। मुठभेड़ असली थी या नकली, यह जाँच के बाद पता चलेगा। लेकिन अब तक प्राप्त सूचनाओं के आधार पर भरत तिवारी द्वारा हथियार फेंक देने के बाद भी पुलिस वालों ने गोली मार दी।

प्रश्न उठता है कि क्या अपराधियों को इस तरह गोली मारी जा सकती है? मेरे विचार से यदि कोई व्यक्ति नामी अपराधी है और वह समाज के लिए खतरनाक हो गया है, ऐसे व्यक्ति को यदि पुलिस नकली मुठभेड़ में मार दे तो यह कोई अपराध नहीं है। लेकिन गंभीर प्रश्न है कि क्या भरत तिवारी ऐसा अपराधी था? यह अभी जाँच होना बाकी है।

यह बात भी सही है कि भरत तिवारी के पास पिस्तौल था और वह अपने पिस्तौल का लगातार प्रयोग कर रहा था। यदि वह पिस्तौल लाइसेंसी था तब अलग विचार हो सकता है और अगर वह पिस्तौल चोरी-छिपे का था तब यह मामला अलग हो सकता है।

लेकिन भरत तिवारी की हत्या ने जिस तरह समाज को दो अलग-अलग गुटों में बाँट दिया है, यह सामाजिक बँटवारा अवश्य गंभीर सोच पैदा करता है।

इसी के साथ, इसी दिन हमारे क्षेत्र में बैकुंठपुर में दो गुटों के बीच टकराव होता है। नौ ब्राह्मणों ने एक साथ जुटकर 6 क्षत्रियों पर आक्रमण किया। उन्हें गाड़ी समेत जला दिया। दो लोगों की मौके पर जलने से मृत्यु हो गई। जान बचाकर भागने वालों को भी पीछा करके पीटा गया और उनमें भी एक-दो मर गए और कुछ लोग अस्पताल में घायल हैं।

भारतीय क्षत्रिय समाज ने बैकुंठपुर में आंदोलन करके पुलिस पर निष्क्रियता का आरोप लगाया है और माँग की है कि इस प्रकार के लोगों पर बुलडोजर कार्रवाई की जाए या अन्य कठोर कार्रवाई की जाए।

एक तरफ भरत तिवारी के मामले में पुलिस की अति-सक्रियता की चर्चा हो रही है, दूसरी तरफ बैकुंठपुर में पुलिस की निष्क्रियता की चर्चा हो रही है और दोनों ही घटनाएँ लगभग एक साथ एक तरह की घटित होती हैं।