धर्म की वास्तविक परिभाषा और संगठनवाद का भ्रम

24 जून प्रातःकालीन सत्र

दुनिया में जो अनेक परिभाषाएँ बदल दी गई हैं, उन बदली हुई परिभाषाओं में एक शब्द धर्म भी शामिल है। धर्म का वास्तविक अर्थ होता है किसी अन्य के हित में किए गए निस्वार्थ कार्य। लेकिन इसके अतिरिक्त भी धर्म की कई परिभाषाएँ प्रचलित हैं। लेकिन जो धर्म की नई परिभाषा विकसित की गई है, वह वास्तव में धर्म की कोई परिभाषा हो ही नहीं सकती है, क्योंकि धर्म किसी भी रूप में संगठन बन ही नहीं सकता।

धर्म हमेशा गुण-प्रधान है और उसमें संगठन बनाने की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती। लेकिन समाज-विरोधी तत्वों ने धर्म की परिभाषा को बदलकर संगठन के रूप में बना दिया। यह गलती सबसे पहले तो बुद्ध ने की। बौद्ध धर्म सबसे पहले संगठन बना। उसके बाद इस्लाम तो पूरा का पूरा संगठन ही बन गया और इस्लाम के संगठन बनने का यह परिणाम हुआ कि सारी दुनिया अब संगठन बनाने की दिशा में मजबूर हो गई।

आज धर्म का वास्तविक अर्थ गौण हो गया है और संगठन ही धर्म का वास्तविक अर्थ बन गया है। इसलिए हम चाहते हैं कि धर्म की इस गलत और नकली परिभाषा से समाज को बचाया जाए।