जब से ट्रंप सत्ता में आए हैं, तब से उन्होंने इस व्यवस्था को उलट-पुलट करना शुरू कर दिया है।

पिछले लंबे समय से दुनिया की राजनीतिक व्यवस्था ताकत और धन के बल पर अपनी सत्ता चलाने की एक तथाकथित शांतिपूर्ण प्रणाली पर आधारित रही है। सभी देशों ने मिलकर एक दिखावटी संयुक्त राष्ट्र संघ भी बना लिया, ताकि दुनिया भ्रम में बनी रहे।
पिछले वर्ष जब से ट्रंप सत्ता में आए हैं, तब से उन्होंने इस व्यवस्था को उलट-पुलट करना शुरू कर दिया है। इस व्यवस्था से शांतिपूर्वक लाभ उठाने के बजाय उन्होंने छीना-झपटी के माध्यम से लाभ लेने का प्रयास शुरू किया। इसका परिणाम यह हुआ कि दुनिया में अशांति बढ़ने लगी। अब तक सभी शक्तियाँ आपस में मिल-बाँटकर लाभ उठाती थीं, लेकिन ट्रंप ने इस व्यवस्था को खुली चुनौती दे दी है।
ऐसी स्थिति में भारत भी अब एक मजबूत पक्षकार के रूप में सामने आता हुआ दिखाई देने लगा है। वर्तमान परिस्थितियों में भारत सरकार को “प्रतीक्षा करो” की नीति पर ही चलना चाहिए, क्योंकि न तो ट्रंप की तानाशाही प्रवृत्तियों का समर्थन किया जा सकता है और न ही चीन या ईरान की विस्तारवादी नीतियों का समर्थन उचित है। दोनों गुटों में से किसी एक के साथ भारत को अभी खुलकर नहीं आना चाहिए।
मेरे विचार से भारत सरकार सही दिशा में कार्य कर रही है। यही कारण है कि मैं भी अभी इस विषय पर कुछ लिखने से बच रहा हूँ, क्योंकि मैं न तो चीन-रूस-ईरान का समर्थन कर सकता हूँ और न ही इस समय ट्रंप का समर्थन या विरोध करना उचित होगा। ऐसा करना जल्दबाजी मानी जाएगी।