सांप्रदायिकता से जातिवाद तक: समाज के सामने नई चुनौती
मैं बचपन से ही सांप्रदायिकता को एक बड़ी समस्या समझता था और उसका समाधान करने का भी प्रयास किया। हम लोगों ने मुसलमानों को भी बहुत समझाने का प्रयास किया और संघ परिवार को भी हम लोगों ने रोकने की कोशिश की कि इन दोनों में किसी तरह का टकराव न हो और मुसलमान समझ जाएँ।
संघ परिवार के लोग तो मेरी बात कुछ-कुछ मानते भी थे, लेकिन मुस्लिम समाज मेरी बात मानने के लिए तैयार नहीं होता था। जब हम लोगों की सरकार बनी और मुसलमान अपने संगठन के सामने किसी की सुनने को ही तैयार नहीं था, तब हम लोगों ने संघ परिवार के साथ मिलकर मुस्लिम सांप्रदायिकता पर आक्रमण शुरू किया।
मुसलमानों ने भी शाहीन बाग आंदोलन और वक्फ आंदोलन के नाम से टकराने की असफल कोशिश की, लेकिन वे असफल हो गए। वर्तमान असम और बंगाल चुनाव के बाद अब मुस्लिम सांप्रदायिकता हार जाने की कगार पर है।
मुसलमानों को अब यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि देश शरीयत से और मनुस्मृति से नहीं चलेगा, देश चलेगा संविधान से।
मुसलमानों की वर्तमान स्थिति को देखते हुए जातिवादी संस्थाओं को बहुत सावधान होना चाहिए कि यदि वे हम लोगों की बात नहीं मानते हैं, तो उनकी वही स्थिति होगी जो आज मुसलमानों की हो रही है।
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