समाज का अर्थ: न जाति, न राष्ट्र, केवल मानव समाज
1 जुलाई, प्रातःकालीन सत्र
हम समाज शब्द पर चर्चा कर रहे हैं। समाज का अर्थ होता है मानव समाज अथवा विश्व मानव समाज अथवा सर्व व्यक्ति समूह। समाज का इसके अतिरिक्त कोई अन्य अर्थ नहीं हो सकता।
समाज के अंदर पशु, पक्षी, जीव-जंतु, पेड़-पौधे यह सब शामिल नहीं होते, क्योंकि इन सबको कोई मौलिक अधिकार घोषित नहीं हैं। इन्हें संवैधानिक अधिकार ही हो सकते हैं। मनुष्य को मौलिक अधिकार प्राप्त हैं।
समाज का अर्थ न कोई जाति है, न कोई राष्ट्रीयता है, न कोई क्षेत्रीयता है, न कोई लिंग-भेद है। समाज में इस तरह का कोई भेद नहीं होता। समाज पूरे साढ़े सात सौ करोड़ व्यक्तियों का समूह माना जाता है।
समाज को ही हम विश्व परिवार कह सकते हैं। इस तरह हमारा दृष्टिकोण बहुत व्यापक होना चाहिए। हम एक व्यक्ति हैं, हम किसी परिवार के सदस्य हैं, हम किसी देश के नागरिक हैं, लेकिन हम संपूर्ण विश्व समाज के भी सदस्य हैं।
हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि व्यक्ति, परिवार या राष्ट्र अंतिम इकाई नहीं है। इसलिए हमारा दृष्टिकोण बहुत व्यापक होना चाहिए। जो लोग धर्म को अंतिम इकाई मानते हैं, वह गलत है। अंतिम इकाई तो विश्व समाज ही मानी जानी चाहिए।
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