महिला-पुरुष संबंधों में कानून, समाज और धर्म का सीमित हस्तक्षेप
11 जुलाई प्रातःकालीन सत्र
महिला और पुरुष के आपसी संबंध कैसे हों, इस मामले में वर्तमान समय में कानून भी बहुत दखल दे रहा है और समाज भी। धर्मगुरु समाज को यह समझाते हैं कि महिला-पुरुष के संबंधों की सीमा इस प्रकार होनी चाहिए, जबकि मेरे विचार से समाज, कानून और धर्मगुरु—ये तीनों अनावश्यक हस्तक्षेप कर रहे हैं।
महिला और पुरुष के संबंध कैसे हों, यह सिर्फ परिवार तय कर सकता है, कोई अन्य नहीं। समाज को इस मामले में पूरी तरह दूर रहना चाहिए। कोई महिला अगर बहुत भड़काऊ कपड़े पहनकर निकलती है और उसके परिवार को कोई आपत्ति नहीं है, तब समाज को इस मामले में चुप रहना चाहिए।
समाज किसी मामले में तभी आपत्ति कर सकता है, जब समाज ने विधिवत ऐसा कोई नियम बनाया हो। नियम का उल्लंघन होने पर भी समाज सिर्फ बहिष्कार कर सकता है, इससे अधिक कुछ नहीं। जब तक कोई ऐसा नियम बना हुआ नहीं है, तब तक कोई भी व्यक्ति समाज के नाम पर इस प्रकार महिला-पुरुष संबंधों पर टीका-टिप्पणी नहीं कर सकता।
मेरा यह मानना है कि धर्मगुरुओं को भी इस मामले में सावधान रहना चाहिए।
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