नई समाज व्यवस्था में विवाह के उद्देश्य और आदर्श विवाह की अवधारणा
12 जुलाई प्रातःकालीन सत्र। हम नई समाज व्यवस्था में विवाह के चार उद्देश्य बनाकर चलेंगे। पहला शारीरिक इच्छा पूर्ति, दूसरा संतान उत्पत्ति, तीसरा सह जीवन की ट्रेनिंग और चौथा बुजुर्ग ऋण मुक्ति। इन चारों उद्देश्यों की एक साथ पूर्ति को सफल विवाह माना जाएगा और विवाह के लिए हम तीन को मिलाकर आदर्श विवाह मानेंगे। पहला वर वधु की स्वीकृति, दूसरा परिवार की सहमति और तीसरा समाज की अनुमति। यदि यह तीनों बातें एक साथ नहीं होगी तो हम उसे आदर्श विवाह नहीं समझेंगे। यद्यपि हम वर वधु की स्वीकृति मात्र से होने वाले विवाह को भी अमान्य नहीं करेंगे, लेकिन हम उसे सामाजिक स्वीकृति नहीं मानेंगे। इसीलिए हम ऐसी विवाह पद्धति बनाएंगे जिसमें तीनों का संतुलन हो और इसी पद्धति को हम प्रोत्साहित करेंगे। हम विवाह के मामले में सरकार के किसी कानून को अनावश्यक मानते हैं। कोई भी विवाह ग्राम सभा के पास ही रजिस्टर्ड होगा, सरकार के पास नहीं। इस तरह हम विवाह, संतान उत्पत्ति, विवाह विच्छेद अर्थात तलाक, इन सबको सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत लेंगे, कानूनी पचड़े से दूर कर देंगे।
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