जंतर मंतर का अनशन और जनआंदोलन की बदलती राजनीति

जंतर-मंतर पर होने वाले सोनम वांगचुक के अनशन ने एक नई समस्या पैदा कर दी है। मेरा यह मानना है कि जो लोग जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं अथवा जिनके तर्कों में दम नहीं होता, वे लोग इस तरह के तरीकों का प्रयोग करते हैं।

अनशन करना एक प्रकार की ब्लैकमेलिंग के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। यदि कोई व्यक्ति अनशन करता है, तो उसमें सरकार को दखल क्यों देना चाहिए? क्योंकि अनशन करना कोई सामाजिक कार्य नहीं है, बल्कि शुद्ध रूप से ब्लैकमेलिंग है।

मैंने तो सुना है कि इरोम शर्मिला ने लगभग 15 वर्षों तक अनशन किया था और उसके बाद जब वह चुनाव लड़ीं, तो उनकी जमानत जब्त हो गई। अरविंद केजरीवाल ने भी अनशन किया था और समाज को ब्लैकमेल किया। अनशन एक प्रकार का व्यापार बन गया है और अनशन करने वालों के साथ किसी प्रकार की कोई सहानुभूति नहीं होनी चाहिए। यह अगर कल मरने वाले हों, तो आज मर जाएँ। इससे समाज को कोई अंतर नहीं पड़ेगा।

सच बात यह है कि जो राजनेता जनता पर प्रभाव नहीं डाल पाते, वे इस तरह के अनशनों का समर्थन करते हैं। माँग चाहे कितनी भी उचित हो, लेकिन अनशन करना उचित मार्ग नहीं है।

हमने स्वतंत्रता की इतनी लंबी लड़ाई लड़ी, लेकिन गांधी ने कभी सरकार के खिलाफ अनशन का सहारा नहीं लिया। इसलिए मेरा विचार है कि इस तरह की दुकानदारी से हम सब लोगों को दूर हो जाना चाहिए।