लोक स्वराज: लोकतंत्र के संशोधित स्वरूप की आवश्यकता
20 जुलाई प्रातःकालीन सत्र
वर्तमान दुनिया में जिस प्रकार लोकतंत्र अनेक स्थानों पर अनियंत्रित होकर अराजकता उत्पन्न करता हुआ दिखाई देता है, उस पर किसी न किसी प्रकार का नियंत्रण आवश्यक प्रतीत होता है। मेरा मानना है कि लोकतंत्र की आड़ में कुछ पेशेवर राजनेता, मीडिया कर्मी, सरकारी कर्मचारी तथा अन्य प्रभावशाली समूह पूरे समाज पर अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए विभिन्न प्रकार के उपाय अपनाते हैं। मनमाने ढंग से टैक्स लगाए जाते हैं, संसाधनों का दुरुपयोग किया जाता है, युद्ध लड़े जाते हैं और इन सबको लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर उचित ठहराने का प्रयास किया जाता है।
मेरे विचार में वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनी अनेक सीमाओं के कारण अपेक्षित परिणाम देने में सफल नहीं हो रही है। यह न तो तानाशाही की प्रवृत्तियों को प्रभावी ढंग से रोक पा रही है, न साम्यवाद जैसी व्यवस्थाओं को नियंत्रित कर पा रही है और न ही विभिन्न प्रकार की कट्टरपंथी या प्रभुत्ववादी प्रवृत्तियों पर प्रभावी अंकुश लगा पा रही है।
ऐसी परिस्थितियों में मेरा मानना है कि लोकतंत्र के एक संशोधित स्वरूप पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। हम राजनेताओं अथवा किसी भी वर्ग की निरंकुशता और दादागीरी को स्वीकार नहीं कर सकते। यदि लोकतांत्रिक व्यवस्था का उपयोग जनता की सेवा के बजाय सत्ता के संरक्षण का माध्यम बनता है, तो उसमें सुधार की आवश्यकता स्वाभाविक है।
इसी उद्देश्य से हम लोक स्वराज अथवा सहभागी लोकतंत्र के रूप में एक संशोधित व्यवस्था की अवधारणा को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। इस दिशा में अब तक हमें गांधीवादी विचारधारा से जुड़े लोगों, आचार्यकुल, संघ परिवार, गायत्री परिवार, आर्य समाज तथा अन्य अनेक सामाजिक संगठनों के व्यक्तियों का समर्थन और सहयोग प्राप्त हो रहा है। धीरे-धीरे इस विषय में जन-जागृति भी बढ़ रही है।
हमें विश्वास है कि भविष्य में लोकतंत्र का एक अधिक उत्तरदायी, सहभागी और जन-केंद्रित स्वरूप दुनिया के सामने प्रस्तुत करने में हम सफल होंगे।
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