तंत्र-मुक्त संविधान और सशक्त राष्ट्रपति

4 अगस्त प्रातः कालीन सत्र। कल मैंने आपको प्रातः काल लिखा था कि हम वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था से पूरी तरह निराश हैं और हम एक नई व्यवस्था की दिशा में सक्रिय हैं। इस संबंध में मैं और साफ कर दूँ कि हम वर्तमान समय में दो अलग-अलग दिशाओं से कार्य कर रहे हैं। एक दिशा है तंत्र-मुक्त संविधान। इसके अंतर्गत हम एक संविधान सभा बना रहे हैं। हम चाहते हैं राष्ट्रपति भी अधिक अधिकार-संपन्न हों। तंत्र उद्दंड न हो जाए, जैसा अभी दिख रहा है। इसकी पूरी जिम्मेदारी संविधान की हो। दूसरी तरफ, हम सशक्त समाज व्यवस्था पर भी सोच रहे हैं। सशक्त व्यवस्था के लिए परिवार व्यवस्था का संशोधित और सशक्त होना आवश्यक है। इस तरह हम तंत्र पर अंकुश लगाने के लिए संविधान और सशक्त समाज के लिए परिवार व्यवस्था को आधार मानकर लगातार कार्य कर रहे हैं। मैं आपको स्पष्ट कर दूँ कि हम सिर्फ समस्याएँ गिनाने वाले लोग नहीं हैं। हम सिर्फ कारणों पर ही मंथन नहीं कर रहे हैं, हम समाधान भी बताएँगे और समाधान करने के लिए संस्थागत ढाँचा भी बनाएँगे। इस तरह हम राजनीतिक व्यवस्था के विकल्प के रूप में एक नई व्यवस्था की शुरुआत कर रहे हैं।