राहुल गांधी को भारतीय परिवार व्यवस्था पर पुनर्विचार करना चाहिए

कल राहुल गांधी ने हमारी भारतीय परिवार व्यवस्था की आलोचना करके बहुत बड़ी गलती की है। हमारी एक परिवार व्यवस्था लंबे समय से चल रही है। उसमें कुछ गलतियाँ हैं, उन गलतियों का हम सुधार भी कर रहे हैं। लेकिन हम उस परिवार व्यवस्था को उचित नहीं समझते, जिस परिवार व्यवस्था का राहुल गांधी ने उदाहरण प्रस्तुत किया है।

मेरा भी अपना परिवार है। मेरे परिवार में अभी सातवीं पीढ़ी है। इस तरह मैंने छह पीढ़ियाँ देखी हैं। हमारे परिवार में महिलाओं और बच्चों को अधिकतम स्वतंत्रता है और हमारे परिवार की महिलाएँ और बच्चे परिवार के अनुशासन को पूरी तरह स्वीकार करते हैं, क्योंकि हम लोग राहुल गांधी सरीखे लोगों से बहुत दूरी बनाकर रखते हैं।

लेकिन एक दूसरा परिवार भी हमारे सामने उदाहरणस्वरूप है और वह है नेहरू परिवार। नेहरू परिवार से लेकर राहुल, प्रियंका और बच्चों तक छह-सात पीढ़ियाँ स्वतंत्रता के बाद गुजरी हैं। आपने वहाँ महिलाओं और बच्चों की स्वतंत्रता तो देखी है, लेकिन परिवार व्यवस्था का जितना गंदा उदाहरण नेहरू से लेकर वर्तमान तक दिखाई देता है, इस उदाहरण को हम हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं।

हमें कभी गांधी नाम की नकल करने की जरूरत नहीं पड़ी। हम सातों पीढ़ी से इस अग्रवाल नाम से जी रहे हैं। हम लोगों ने गरीबी भी देखी है, अमीरी भी देखी है, लेकिन नेहरू परिवार ने आज तक सत्ता की ब्लैकमेलिंग के अतिरिक्त अपने जीवन में कुछ नहीं देखा है।

कल राहुल गांधी ने पुणे में जिस तरह का भाषण दिया, वह राहुल ने अपनी योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि सोनिया गांधी के गर्भ से पैदा होने के कारण दिया। अन्यथा राहुल सरीखे कितने लोग विपक्ष के नेता बनने के लिए तैयार खड़े हैं। लेकिन ये लोग राहुल सरीखे सोनिया के गर्भ से पैदा नहीं हुए हैं।

इसलिए मेरा यह मानना है कि राहुल गांधी को अपने कम्युनिस्ट और अंबेडकरवादी मित्रों को खुश करने के लिए मनुस्मृति की गलत आलोचना नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि हम लोग अपने परिवार व्यवस्था में मनुस्मृति के अनुसार स्वतंत्रता और सहजीवन का तालमेल बनाकर रखना जानते हैं।

हमें गर्व है कि हम राहुल गांधी को आदर्श परिवार समझाने की क्षमता रखते हैं। मेरा राहुल गांधी से निवेदन है कि वह परिवार व्यवस्था को तोड़ने के अपने अभियान पर फिर से विचार करें। अन्यथा अपने नाम के साथ गांधी लगाना छोड़ दें।