नई समाज व्यवस्था में परिवार को प्राथमिक इकाई बनाने की सोच

24 अगस्त प्रातः कालीन सत्र। हम नई समाज व्यवस्था का जिस तरह का प्रारूप सोच रहे हैं, उस व्यवस्था में हम लोगों ने परिवार व्यवस्था को प्राथमिक इकाई माना है। लेकिन परिवार व्यवस्था के मामले में हमारी सोच और अन्य लोगों की सोच में फर्क है। हम परंपरागत परिवार व्यवस्था को अब संशोधित करना चाहते हैं। हमारा यह मानना है कि परिवार प्राकृतिक इकाई नहीं, बल्कि संगठनात्मक इकाई होनी चाहिए। परिवार आपसी सहमति से ही चलना चाहिए, भले ही वह खून का रिश्ता हो या न हो।

दूसरी बात यह है कि हम परिवार में सबको समान अधिकार देना चाहते हैं और परिवार में अनुशासन अनिवार्य होगा। स्पष्ट है कि हमारी नीति में किसी भी व्यक्ति को परिवार छोड़ने या परिवार से निकालने की पूरी स्वतंत्रता होगी। कोई कानूनी बंधन नहीं आएगा।

इस तरह हम एक संशोधित परिवार व्यवस्था का प्रस्ताव दे रहे हैं। हमारे प्रस्ताव में यह बात भी महत्वपूर्ण है कि यदि किसी संतान का जन्म होता है तो वह नई संतान माँ के नाम से जानी जाएगी। उसका पिता कौन है, इसकी कोई खोजबीन भी नहीं होगी, कोई पहचान भी नहीं होगी। पिता का मामला परिवार का आंतरिक मामला है, संवैधानिक नहीं। संविधान के अनुसार संतान माँ के साथ जुड़ेगी तथा माँ के परिवार में मानी जाएगी।

इस तरह हम लोगों ने परिवार व्यवस्था में कुछ संशोधन किए हैं। हम लोकतांत्रिक परिवार के पक्ष में हैं, परंपरागत परिवार व्यवस्था के नहीं।