संक्रांति की बेला में हम नई समाज-व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं।

14 जनवरी प्रातःकालीन सत्र
संक्रांति की बेला में हम नई समाज-व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। यह समाज-व्यवस्था पूरी दुनिया के लिए सोची जा रही है। यह किसी धर्म, जाति या राष्ट्र तक सीमित नहीं है।
इस व्यवस्था के अंतर्गत केवल बल प्रयोग और धोखाधड़ी को ही अपराध माना जाएगा। इनके अतिरिक्त कोई भी कार्य अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा। इसका स्पष्ट अर्थ है कि यदि कोई व्यक्ति आपसी सहमति से अपने शरीर का कोई भाग या अपना पूरा श्रम बेचता है, यदि कोई व्यक्ति लोभ या लालच के कारण अपना धर्म परिवर्तन करता है, यदि कोई व्यक्ति आपसी सहमति से यौन संबंधों का आदान-प्रदान करता है, या यदि कोई व्यक्ति अपनी किडनी आदि बेचता है, तो उसे किसी कानून द्वारा रोका नहीं जाएगा।
स्पष्ट है कि खरीद–बिक्री व्यक्तियों की आपसी स्वतंत्रता का विषय है, जब तक उसमें कोई बल प्रयोग या धोखाधड़ी न हो। यह भी आवश्यक है कि किसी भी प्रकार की खरीद–बिक्री या समझौते के बाद भी व्यक्ति की स्वतंत्रता बनी रहे। अर्थात उसकी सहमति निरंतर आवश्यक होगी। व्यक्ति किसी भी समय अपनी सहमति वापस लेने के लिए स्वतंत्र होगा।
केवल बल प्रयोग या धोखाधड़ी की स्थिति में ही कानून को किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने का अधिकार होगा। वर्तमान भारत में इस विषय से संबंधित जितने भी कानून बने हुए हैं, उन पर पुनर्विचार करते हुए उन्हें समाप्त किया जाना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या करना चाहता है, तो उसे किसी कानून द्वारा रोका नहीं जाना चाहिए।