यह स्पष्ट किया गया कि व्यवस्था चाहे कोई भी क्यों न हो, जब वह रूढ़ हो जाती है तो
1 फरवरी के प्रातःकालीन सत्र में यह स्पष्ट किया गया कि व्यवस्था चाहे कोई भी क्यों न हो, जब वह रूढ़ हो जाती है तो उसमें विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न होने लगती हैं। इसी कारण हिंदू समाज में एक ब्राह्मण वर्ग की संकल्पना की गई थी, जिसका कार्य निरंतर समाज की सभी प्रकार की व्यवस्थाओं पर चिंतन-मंथन करना और समयानुसार उनमें संशोधन के सुझाव देना था।
जैसी वर्ण व्यवस्था हिंदू समाज में विकसित हुई, वैसी व्यवस्था अन्य किसी धर्म में नहीं दिखाई देती। यही कारण है कि अन्य धर्मों में भी समय के साथ अनेक प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न होती चली गईं। किंतु पिछले कुछ समय से जब हिंदू समाज की वर्ण व्यवस्था स्वयं विकृत होकर रूढ़ हो गई, तो स्वाभाविक रूप से उसमें भी गंदगी और जड़ता आ गई। इसका परिणाम आज यह है कि हम अपनी धार्मिक व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था या राजनीतिक व्यवस्था—किसी में भी परिस्थिति-जन्य सुधार नहीं कर पा रहे हैं।
जो बीमारी पहले मुसलमान समाज में दिखाई देती थी, वही बीमारी अब हिंदू समाज में भी प्रवेश कर चुकी है। इसलिए मेरा यह सुझाव है कि हमें ऐसी व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए, जिसमें हमारी सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं पर विद्वानों और विचारकों का एक समूह निरंतर चिंतन करता रहे और समय-समय पर समाज के सामने सुधारात्मक प्रस्ताव रखता रहे, ताकि समाज रूढ़िवाद से बाहर निकलकर स्वयं को सुधार सके।
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