हम महिला–पुरुष संबंधों पर एक गंभीर और मूलभूत चर्चा कर रहे हैं। यह विषय आदिवासी और दलित संबंधों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है

हम महिला–पुरुष संबंधों पर एक गंभीर और मूलभूत चर्चा कर रहे हैं। यह विषय आदिवासी और दलित संबंधों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका सीधा प्रभाव परिवार व्यवस्था पर पड़ता है, जो समाज व्यवस्था की नींव है। इसके विपरीत, दलित–आदिवासी संबंध मुख्यतः समाज व्यवस्था को प्रभावित करते हैं, परिवार व्यवस्था को नहीं। इसलिए महिला–पुरुष के बीच उत्पन्न टकराव समाज के लिए कई गुना अधिक घातक सिद्ध हो सकता है।
इस विषय पर मैंने गहराई से विचार किया है और अपने निष्कर्षों के आधार पर यह पाया है कि समाज में महिलाओं के साथ जिस व्यापक अत्याचार की बात की जाती है, वह वास्तविकता से कहीं अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत की गई है। अत्याचार से संबंधित अनेक कथन अतिरंजित हैं और तथ्यों पर आधारित नहीं प्रतीत होते।
यह स्वीकार करना आवश्यक है कि हमारी समाज व्यवस्था में कुछ त्रुटियाँ अवश्य रही हैं, किंतु इन्हीं सीमित त्रुटियों को अत्यधिक बढ़ाकर समाज-विरोधी तत्वों ने अपने हित साधे हैं। मेरा स्पष्ट मत है कि महिला और पुरुष के बीच संबंधों में महिलाओं पर कोई व्यवस्थित, वर्गगत या सामाजिक स्तर का अत्याचार नहीं हुआ है। यदि कहीं कोई गलत घटना हुई भी है, तो वह व्यक्तिगत स्तर की रही है, न कि सामाजिक या वर्गीय स्तर की।
परिवार व्यवस्था के भीतर भी महिलाओं पर किसी प्रकार के संगठित अत्याचार का प्रमाण नहीं मिलता। इसलिए इस विषय पर हमें मूल स्तर से विचार करना होगा—विशेष रूप से यह समझने की आवश्यकता है कि इस प्रकार के प्रचार को फैलाने वालों की मंशा क्या थी।
हाँ, जहाँ भी वास्तविक रूप से गलतियाँ हुई हैं, उन्हें स्वीकार करना और सुधारना आवश्यक है। इसी संतुलित और तथ्यपरक दृष्टिकोण के साथ यह चर्चा आगे भी जारी रहनी चाहिए।