पक्ष और विपक्ष : लोकतंत्र की संरचनात्मक आवश्यकता

दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों की सरकारें समाज को अपने प्रभाव में बनाए रखने के लिए अनेक लोकप्रिय व्यवस्थाएँ अपनाती हैं। इन व्यवस्थाओं में एक प्रमुख तरीका यह है कि सरकारें स्वयं को पक्ष और विपक्ष के रूप में विभाजित कर लेती हैं। जिस प्रकार न्यायालय में वकील अलग-अलग पक्षों में बँटकर बहस करते हैं, जिस तरह कव्वाल मंच पर कव्वाली के दौरान नाटकीय संवाद प्रस्तुत करते हैं, या जैसे रामलीला में दो पात्र राम और रावण बनकर युद्ध का अभिनय करते हैं—उसी प्रकार राजनीति में भी पक्ष और विपक्ष के रूप में निरंतर टकराव का वातावरण बनाया जाता है।
इस निरंतर टकराव से हम जैसे 98% सामान्य लोग प्रभावित हो जाते हैं। हम भी स्वयं को पक्ष और विपक्ष में बाँटकर उसी संघर्ष का हिस्सा बनने लगते हैं। जबकि वास्तविकता यह हो सकती है कि उनका यह विभाजन केवल राजनीतिक भूमिका तक सीमित हो। जब भी उन्हें समाज सशक्त और संगठित होता हुआ दिखाई देता है, तो वे आपसी मतभेद भुलाकर साथ बैठकर योजनाएँ बना सकते हैं।
यह व्यवस्था विश्व स्तर पर अत्यंत सफल मानी जाती है, और भारत में भी इसे व्यापक सफलता मिली है। इसलिए अब समय आ गया है कि हम पक्ष और विपक्ष की इस परंपरागत राजनीति पर पुनर्विचार करें। राजनीति में एक निष्पक्ष व्यवस्था होनी चाहिए, जहाँ चुना हुआ प्रतिनिधि पूर्णतः स्वतंत्र हो और किसी भी प्रकार से किसी पक्ष या विपक्ष के साथ बँधने के लिए बाध्य न हो।