समाज में सरलता और चतुराई का संघर्ष: एक यथार्थ

समाज में आमतौर पर दो तरह के लोग होते हैं या तो वे शरीफ लोग होते हैं जो आमतौर पर ठगे जाते हैं और जिन्हें आमतौर पर मूर्ख कहा जाता है या वे धूर्त लोग होते हैं जो ऐसे शरीफ लोगों का उपयोग करते हैं और उन्हें ठगते हैं। हम अल्पसंख्यक जो समझदार लोग हैं उनके सामने दो तरफ संकट आ जाता है कि यदि हम इन धूर्त लोगों को बेनकाब करते हैं तो हमें शरीफ लोग ही गाली देना शुरू कर देते हैं । जब भी हम समान नागरिक संहिता की बात करते हैं तब यह धूर्त लोग शरीफ लोगों को इसका विरोध करने के लिए आगे कर देते हैं। हम पिछले तीन-चार बार यूजीसी पर लिख चुके। विरोध करने में धूर्त तो कम आगे आए और शरीफ लोग अधिक आगे आए। हमें भद्दी भद्दी गालियां सुनने को मिली। हम महिला आरक्षण का विरोध करते हैं तो अनेक महिलाएं हमारे ऊपर चढ़ बैठती है हमें उनकी बहुत भद्दी बातें सुनाई पड़ती है। हम अंबेडकर की आलोचना करते हैं हम अंबेडकर को हमेशा खतरनाक मानते हैं लेकिन यह अंबेडकरवादी हमें दिन-रात खुलकर धमकियां देते हैं फिर भी हम इन यूजीसी वाले महिलाएं या अंबेडकर वादियों की सौ तरह की गलियां सुनकर भी चुप रहते हैं क्योंकि हम सामाजिक एकता के पक्षधर है इस समय सामाजिक एकता को सबसे बड़ा खतरा इस्लामी संगठन वाद है दुनिया के सामने तो है ही लेकिन भारत के सामने तो यह खतरा प्रत्यक्ष बन गया है। हम किसी भी परिस्थिति में अपने मूर्ख साथियों की गलियों की परवाह नहीं करते क्योंकि हम यह नहीं चाहते हैं कि मुस्लिम सांप्रदायिकता से टकराव में हमारी आपसी फूट पड़े। हम कल दिनभर मूर्खों की गलियां सुनकर भी चुप रहे इसका यह अर्थ नहीं है कि हमारे पास उत्तर नहीं है इसका अर्थ यह है कि हमें वर्तमान परिस्थितियों में समझदारी से काम लेना है। जब इस्लामी सांप्रदायिकता का खतरा टल जाएगा तब आपस में आमने-सामने बैठकर संवाद की हिम्मत हो जाएगी। अभी हममे ना इतनी हिम्मत है ना जरूरत है क्योंकि हमारा एकमात्र शत्रु इस्लामिक कट्टरवाद है आपसी विवाद नहीं।