जंतर-मंतर और रांची के आंदोलनों के बाद देश की दिशा पर नए सवाल

जेन जी द्वारा जंतर-मंतर पर और रांची में छात्रों के आंदोलन के बाद यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या देश ठीक दिशा में जा रहा है। इस विषय पर भी मैंने विचार किया। पहले देश में बदलाव के लिए जन-जागरण पर भरोसा था, उसके बाद देश में बदलाव के लिए संसद पर भरोसा शुरू हुआ, लेकिन विपक्ष दोनों जगह से निराश हुआ और तब विपक्ष ने एक तीसरा मार्ग चुना—सड़कों का, जन-आंदोलन का। यह इतना एकाएक हुआ कि पहले किसी को आभास नहीं हुआ कि अब विपक्ष अपनी लाइन बदल रहा है। यही कारण है कि सत्ता पक्ष को अपनी लाइन बदलने में थोड़ी-सी देर हुई।

अब वह खतरा टल गया है, लेकिन अब पूरे देश भर में आंदोलन की एक नई लहर पैदा होगी। सरकार भी इसके लिए तैयार हो रही है, क्योंकि नक्सलवाद पर नियंत्रण और मुस्लिम सांप्रदायिकता पर सफल अंकुश के बाद अब सरकार को इस नए खतरे से निपटना है। आंदोलन के नाम पर आई हुई सड़कों पर हिंसक भीड़ से निपटने के लिए सरकार को कुछ कानूनी प्रावधान भी करने पड़ेंगे। जिस तरह की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता अभी तक दी गई है, उसमें कुछ बदलाव भी हो सकते हैं। लेकिन इस आंदोलन की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने के लिए सरकार को कुछ न कुछ करना ही होगा।

मुझे यह आभास दिखता है कि जिस तरह नक्सलवाद चरम पर आया, समाधान हो गया, मुस्लिम सांप्रदायिकता चरम पर आई तो समाधान हो गया, इस तरह यह जन-आंदोलन का सैलाब भी चरम पर आएगा तो इसका भी समाधान हो सकता है। सरकार सफलतापूर्वक आगे जा रही है, चिंता की कोई बात नहीं है।

मेरी अपने सभी साथियों को यह सलाह है कि आप किसी भी प्रकार के जन-आंदोलन से दूर रहें। हम जन-जागृति और लोकतांत्रिक तरीके पर ही विश्वास करेंगे।