नरवणे जी की पुस्तक इस समय बाज़ार में सीमित रूप से उपलब्ध है।
नरवणे जी की पुस्तक इस समय बाज़ार में सीमित रूप से उपलब्ध है। इस पुस्तक के जिस अंश को राहुल गांधी संसद में पढ़ना चाहते हैं, उस अंश में सरकार के खिलाफ कोई भी पंक्ति नहीं है, बल्कि वह पूरी तरह सरकार के पक्ष में ही जाता है।
उस अंश के अनुसार, भारत ने एक दिन पहले एक खाली टीले पर कब्जा कर लिया था। उस कब्जे को चुनौती देने के लिए चीन के टैंक आगे बढ़ रहे थे। इस स्थिति में नरवणे जी ने सरकार से मार्गदर्शन माँगा और सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिया कि गोली नहीं चलाई जानी है।
जब चीनी टैंक लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर आ गए, तब नरवणे जी ने दोबारा सरकार से पूछा। सरकार ने उत्तर दिया कि बातचीत हो चुकी है और अगले दिन सुबह 8 बजे भारत और चीन के बीच इस विषय पर औपचारिक चर्चा होगी। इसके बावजूद टैंक आगे बढ़ते रहे।
जब टैंक मात्र 50 मीटर की दूरी पर रह गए, तब नरवणे जी ने एक बार फिर सरकार से पूछा। इस बार सरकार ने कहा कि प्रधानमंत्री जी से बात हो चुकी है और अब आप जो उचित समझें, वह निर्णय लें। टैंक आगे बढ़ते रहे, लेकिन अंततः सीमा रेखा पर आकर रुक गए।
मेरी समझ में सरकार ने इस पूरे घटनाक्रम में अत्यंत सूझबूझ का परिचय दिया। गोली चलाने का आदेश नहीं दिया जाना सही निर्णय था। इस संदर्भ में नरवणे जी कुछ हद तक जल्दबाजी दिखा रहे थे।
लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि यदि यह पूरा प्रसंग सरकार के पक्ष में जाता है, तो फिर सरकार इस विषय को संसद में आने से रोक क्यों रही है? और दूसरी ओर राहुल गांधी इस अंश को पढ़ने पर इतनी ज़िद क्यों किए हुए हैं?
स्पष्ट प्रतीत होता है कि राहुल गांधी संसद की कार्यवाही चलने नहीं देना चाहते, और सरकार भी किसी न किसी कारण से यही चाहती है—बस अंतर यह है कि सरकार चाहती है कि संसद न चलने का दोष राहुल गांधी के सिर जाए। विपक्ष के कई नेता संसद की कार्यवाही जारी रखना चाहते हैं और सरकार इस परिस्थिति का राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है।
यह भी संभव है कि सरकार का यह मानना हो कि सरकार और सेना के बीच हुई आंतरिक बातचीत को संसद में चर्चा का विषय बनाना एक गलत परंपरा स्थापित करेगा, इसलिए वह इसे रोक रही हो।
कारण चाहे जो भी हों, लेकिन यह स्पष्ट है कि राहुल गांधी की मूर्खता और सरकार की चालाकी के बीच संसद का अमूल्य समय लगातार बर्बाद हो रहा है।
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