मैं प्रतिदिन तीन–चार पोस्ट लिखता हूँ। इनमें से प्रातःकाल मैं नई समाज-व्यवस्था को लेकर अपनी कल्पना पर लिखता हूँ।
मैं प्रतिदिन तीन–चार पोस्ट लिखता हूँ। इनमें से प्रातःकाल मैं नई समाज-व्यवस्था को लेकर अपनी कल्पना पर लिखता हूँ। मैं यह भली-भाँति जानता हूँ कि प्रातःकाल जो कुछ मैं लिखता हूँ, वह आप सबकी दृष्टि में यूटोपिया जैसा प्रतीत हो सकता है, लेकिन मैं इसे आत्मसंतोष और जन-जागरण के उद्देश्य से प्रतिदिन लिखता हूँ।
मैं यह भी समझता हूँ कि वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्याएँ साम्यवादी विचारधारा और इस्लामी संगठनवाद हैं, और वर्तमान में इन दोनों को नेहरू परिवार का समर्थन प्राप्त है। इसी कारण मैं दिन में दो–तीन बार साम्यवाद, इस्लाम और विपक्षी दलों पर भी अपने विचार लिखता रहता हूँ।
लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या मेरे मन में कोई एक नई सामाजिक संरचना है, जिसे मैं स्थापित करना चाहता हूँ। इस संबंध में मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं कोई नया समाज बनाने का प्रयास नहीं कर रहा हूँ। मैं तो केवल वर्तमान समाज-व्यवस्था में ऐसे सुधारों का प्रस्ताव रख रहा हूँ, जिनके माध्यम से अपने आप एक नई समाज-व्यवस्था का निर्माण हो सके।
हमारे बनाने से कोई नया समाज नहीं बनता। समाज का निर्माण व्यवस्था में परिवर्तन से होता है। इसी उद्देश्य से हम दो दिशाओं में कार्य कर रहे हैं।
पहली दिशा यह है कि प्रातःकाल मैं समाज में ऐसा जन-जागरण करने की बात लिखता हूँ, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक बुराइयाँ धीरे-धीरे समाप्त हो जाएँ और एक नई समाज-व्यवस्था स्वतः आकार लेने लगे।
दूसरी दिशा यह है कि नई समाज-व्यवस्था के निर्माण में बाधक तत्व—साम्यवाद, मुस्लिम संगठनवाद और भारत के विपक्षी दल—इन तीनों पर निरंतर वैचारिक प्रहार किया जाए।
जब इन दोनों दिशाओं से जन-जागरण होगा, तब एक ओर समाज की बुराइयाँ दूर होंगी और दूसरी ओर उन बुराइयों से लाभ उठाने वाले तत्वों पर नियंत्रण स्थापित होगा। इस प्रक्रिया से अपने आप नई समाज-व्यवस्था का निर्माण होगा।
हमें कुछ अलग से बनाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि समाज किसी के बनाए से नहीं बनता; समाज तो अपनी बुराइयों को दूर करने से बनता है।
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