कल महाराष्ट्र नगर निगम के चुनाव के नतीजे आए। महाराष्ट्र के ये चुनाव सिर्फ स्थानीय स्तर के नहीं थे, न ही केवल क्षेत्रीय या राजनीतिक थे;
कल महाराष्ट्र नगर निगम के चुनाव के नतीजे आए। महाराष्ट्र के ये चुनाव सिर्फ स्थानीय स्तर के नहीं थे, न ही केवल क्षेत्रीय या राजनीतिक थे; ये राष्ट्रीय स्तर की बहस के मुद्दे बन गए थे।
एक तरफ ठाकरे बंधुओं की गुंडागर्दी की भाषा थी और दूसरी तरफ गुंडागर्दी से मुक्ति की इच्छा। एक ओर क्षेत्रवाद था, तो दूसरी ओर राष्ट्रवाद। एक तरफ मराठी अस्मिता थी, तो दूसरी तरफ हिंदू अस्मिता।
महाराष्ट्र के लोगों ने एकजुट होकर यह संदेश दिया कि वे राष्ट्रवाद, हिंदू एकता और शराफत के पक्ष में हैं। मुंबई के लोगों ने भी यह साफ कर दिया कि वे गुंडागर्दी को पसंद नहीं करते।
महाराष्ट्र के लोगों ने इस गुंडागर्दी को तो लगभग कब्र में डाल दिया है, लेकिन मुंबई में इसके कुछ अंश अभी भी बचे हुए हैं, जो आने वाले वर्षों में और अधिक दिखाई देंगे। राज ठाकरे की दुर्गति तो होनी ही थी, लेकिन उद्धव ठाकरे ने भी अपनी दुर्गति स्वयं कर ली।
उद्धव ठाकरे को कभी एक चरित्रवान राजनेता माना जाता था, लेकिन कुर्सी पर बैठते ही वे राजनीतिक वेश्याओं के चक्कर में पड़ गए। आज उसी का नतीजा है कि वे एक गंभीर राजनीतिक बीमारी के शिकार हो गए हैं। मैंने पहले भी निवेदन किया था कि उद्धव इन वैश्याओं का साथ छोड़ दें, लेकिन उन्हें इसका चस्का लग गया।
सच्चाई यह है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत की जनता बहुत समझदार हो गई है। उसने धूर्त अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में निपटाया, नासमझ राहुल को हरियाणा में निपटाया, दादागिरी के बल पर राजनीति करने वाले लालू परिवार को बिहार में निपटाया और अब गुंडागर्दी के सहारे राजनीति करने वाले ठाकरे परिवार को महाराष्ट्र में निपटाया है।
हमें इसके लिए देश की जनता को धन्यवाद देना चाहिए। अब हमारी बस यही इच्छा है कि यदि सर्वगुण-संपन्न ममता को भी बंगाल में निपटा दिया जाए, तो बहुत अच्छा होगा।
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