मैं किसी भी प्रकार के आरक्षण का पूर्णतः विरोधी हूँ—चाहे वह जातीय आरक्षण हो, धार्मिक आरक्षण हो, या महिला-पुरुष के आधार पर दिया गया आरक्षण हो।

मैं किसी भी प्रकार के आरक्षण का पूर्णतः विरोधी हूँ—चाहे वह जातीय आरक्षण हो, धार्मिक आरक्षण हो, या महिला-पुरुष के आधार पर दिया गया आरक्षण हो। मेरे मत में किसी भी प्रकार का आरक्षण नहीं होना चाहिए।
इसके साथ ही, वर्तमान समय में सरकार द्वारा लागू किए जा रहे आरक्षणों के संदर्भ में मैं सरकार की मजबूरी को भी समझता हूँ। इसी कारण मैं सरकार द्वारा दिए गए आरक्षणों का विरोध नहीं करता। मैं यह भली-भांति जानता हूँ कि ये आरक्षण उचित नहीं हैं, फिर भी वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में इन्हें एक मजबूरी के रूप में अपनाया गया है।
इसीलिए मैं दोनों दिशाओं में कार्य करता हूँ। एक ओर मैं समाज में आरक्षण के विरुद्ध जन-जागरण करता हूँ, और दूसरी ओर सरकार द्वारा लागू किए गए आरक्षणों का समर्थन भी करता हूँ। मैं उन लोगों में शामिल नहीं हूँ जो आरक्षण के नाम पर राजनीति करते हैं।
भारत में अनेक ऐसे विपक्षी नेता हैं जो एक ओर सामाजिक व्यवस्था में आरक्षण का समर्थन करते हैं, और दूसरी ओर सरकार यदि कोई आरक्षण लागू करती है तो उसका विरोध भी करते हैं। यह दोहरा आचरण है, जिसे समझना आवश्यक है।
पिछले दो-तीन दिनों में मेरे कई मित्रों ने यूजीसी में हुए कुछ बदलावों पर मेरी प्रतिक्रिया जाननी चाही। मेरे विचार से सरकार जो कर रही है, वह उचित है; उसमें कोई त्रुटि नहीं है। किंतु जो कुछ समाज में हो रहा है, वह सामाजिक दृष्टि से बिल्कुल गलत है। इस विषय में समाज के भीतर जन-जागरण किया जाना चाहिए।
मैं उन लोगों के विरुद्ध हूँ जो एक ओर जातीय जनगणना की बात करते हैं और दूसरी ओर सरकार पर दबाव डालते हैं कि वह जातिवाद का विरोध करे। ऐसे पेशेवर और अवसरवादी लोगों का सामाजिक स्तर पर विरोध होना चाहिए।