हम वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा वैश्विक—सभी प्रकार की व्यवस्थाओं में आमूल-चूल परिवर्तन के पक्षधर हैं।

26 जनवरी : प्रातःकालीन सत्र
हम वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा वैश्विक—सभी प्रकार की व्यवस्थाओं में आमूल-चूल परिवर्तन के पक्षधर हैं। इस परिवर्तन में कुछ मूलभूत बदलाव आवश्यक प्रतीत होते हैं—
पहला। प्रत्येक व्यक्ति को असीम स्वतंत्रता दी जाए। उसकी स्वतंत्रता में तब तक कोई बाधा न उत्पन्न की जाए, जब तक वह किसी अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा उत्पन्न न करे।
दूसरा। प्रत्येक व्यक्ति का समाज से जुड़ा होना अनिवार्य हो। कोई भी व्यक्ति पूर्णतः अकेला नहीं रह सकता। इस प्रकार सहजीवन उसके लिए अनिवार्य होगा।
तीसरा। व्यवस्था की पहली इकाई परिवार होगी और अंतिम इकाई समाज। परिवार का अर्थ होगा—दो सहमत व्यक्तियों का संयुक्त जीवन, तथा समाज का अर्थ होगा—संपूर्ण मानव समाज।
चौथा। व्यक्ति के लिए नियम-कानून परिवार द्वारा बनाए जा सकते हैं, अथवा परिवार की सहमति से गठित कोई इकाई उन्हें निर्धारित कर सकती है। समाज को केवल अनिवार्य परिस्थितियों में ही नियम-कानून बनाने चाहिए। सरकार को सुरक्षा और न्याय के अतिरिक्त कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।
मैं इन चार आधारों पर एक नई समाज व्यवस्था की कल्पना कर रहा हूँ।