राष्ट्र बनाम परिवार और गाँव की संप्रभुता : शेखर गुप्ता के विचारों की समीक्षा
मैं सामान्यतः Shekhar Gupta को एक गंभीर विचारक मानता हूँ और उनके लेख ध्यानपूर्वक पढ़ता हूँ। इसी प्रकार मैं चार-पाँच अन्य लेखकों को भी पसंद करता हूँ और उनके विचार नियमित रूप से पढ़ता हूँ। आज उन्होंने यह विषय उठाया कि संप्रभुता का अर्थ निर्णय लेने की पूर्ण स्वतंत्रता से है। इस बात से मैं सहमत हूँ। वास्तव में संप्रभुता का मूल अर्थ निर्णय लेने की स्वतंत्रता ही है।
किन्तु इसके साथ एक महत्वपूर्ण शर्त भी जुड़ी होती है—निर्णय लेने की स्वतंत्रता अपनी इकाई की सीमा तक ही मान्य होती है। कोई भी संप्रभु इकाई न तो अपने से नीचे की संप्रभु इकाई के विषय में मनमाना निर्णय ले सकती है और न ही अपने से ऊपर की इकाई के क्षेत्र में हस्तक्षेप कर सकती है। अतः संप्रभुता का अर्थ असीम और निरंकुश स्वतंत्रता नहीं है।
मेरे दृष्टिकोण से व्यक्ति भी एक संप्रभु इकाई है और विश्व भी एक संप्रभु इकाई है। दोनों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता है, बशर्ते वह किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न बने। इसका आशय यह है कि व्यक्ति से लेकर विश्व-स्तर तक स्वतंत्रता की सीमाएँ स्वाभाविक रूप से निर्धारित हैं। इनके बीच स्थित सभी इकाइयाँ—जैसे परिवार, ग्राम, समुदाय, प्रदेश और राष्ट्र—अपनी-अपनी इकाईगत स्वतंत्रता के भीतर ही निर्णय लेने की अधिकारी होनी चाहिए।
दुर्भाग्य से वर्तमान समय में राष्ट्र ने स्वयं को सर्वोच्च संप्रभु घोषित कर दिया है, परंतु वह परिवार, गाँव और अन्य सामाजिक इकाइयों को समान स्तर की संप्रभुता देने के लिए तैयार नहीं है। यह स्थिति संतुलित नहीं कही जा सकती। जिस प्रकार राष्ट्र एक संप्रभु इकाई है, उसी प्रकार परिवार भी एक संप्रभु इकाई है और ग्राम व्यवस्था भी एक संप्रभु इकाई है। इन इकाइयों की स्वायत्तता छीनकर केवल राष्ट्र की संप्रभुता को सर्वोपरि मान लेना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है।
इसलिए आवश्यक है कि संप्रभुता की एक संशोधित और संतुलित परिभाषा समाज के सामने प्रस्तुत की जाए, जिसमें व्यक्ति से लेकर विश्व तक सभी इकाइयों की स्वायत्तता और सीमाओं को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाए।
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