महिला और पुरुष के बीच आपसी संबंध कैसे हों—यह तय करना परिवार का कार्य है, समाज का नहीं।

हमारी समाज व्यवस्था स्पष्ट रूप से गलत दिशा में जा रही है। महिला और पुरुष के बीच आपसी संबंध कैसे हों—यह तय करना परिवार का कार्य है, समाज का नहीं। किंतु समाज लगातार इस क्षेत्र में हस्तक्षेप करता जा रहा है।
महिलाएँ कैसे कपड़े पहनें, किस प्रकार बातचीत करें, शिक्षा प्राप्त करें या पारिवारिक कार्य करें—ये सभी निर्णय या तो परिवार द्वारा किए जाने चाहिए या स्वयं व्यक्ति द्वारा। समाज को इसमें हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।
सामाजिक हस्तक्षेप का ही परिणाम है कि आज यह प्रश्न पूरी तरह विवादास्पद बन गया है कि महिला और पुरुष के बीच व्यक्तिगत दूरी घटनी चाहिए या बढ़नी चाहिए। समाज स्वयं भी यह तय नहीं कर पा रहा है कि दोनों के बीच निकटता उचित है या दूरी।
अनुभव यह बताता है कि महिला और पुरुष के बीच पारस्परिक आकर्षण स्वाभाविक रूप से बना रहना चाहिए, किंतु पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि कुछ लोगों की गलतियों के कारण यह आकर्षण विकर्षण में बदलता जा रहा है। इसके परिणाम भविष्य में अत्यंत गंभीर होंगे। जन्म दर में भारी गिरावट आएगी और एक बार गिरने के बाद उसे बढ़ा पाना लगभग असंभव हो जाएगा। इसके साथ ही अप्राकृतिक यौन आचरण में भी तीव्र वृद्धि होगी।
इसी कारण, एक समाज वैज्ञानिक के रूप में, मैं समाज के लोगों को सावधान करना चाहता हूँ कि वे पारिवारिक मामलों में हस्तक्षेप पूरी तरह बंद करें। विवाह कब होना चाहिए, महिला और पुरुष के बीच कैसे संबंध होने चाहिए—इस प्रकार की सलाह केवल निकम्मे धर्मगुरु ही देते हैं।
राज्य तो पहले से ही सौ प्रतिशत गलत दिशा में जा रहा है, किंतु समाज से अभी भी बहुत अपेक्षाएँ हैं।