विपक्षी शंकराचार्य ने जिस प्रकार की कल्पना की थी, वह उनकी कल्पना अब स्वप्न बनकर रह गई प्रतीत होती है।
विपक्षी शंकराचार्य ने जिस प्रकार की कल्पना की थी, वह उनकी कल्पना अब स्वप्न बनकर रह गई प्रतीत होती है। देश में कोई बवंडर नहीं उठा। संघ परिवार तत्काल खुलकर सामने आ गया और हिंदुओं के बहुमत ने संघ का साथ दिया, शंकराचार्य का नहीं। ऐसा अनुभव हो रहा है कि अब चार-पाँच दिनों के भीतर ही शंकराचार्य जी हार-थक कर अपना धरना समाप्त कर देंगे और मेला क्षेत्र छोड़कर चले जाएंगे, क्योंकि यह वह शंकराचार्य नहीं हैं जो जान देने को तैयार रहते हों। यह सुविधा-भोगी शंकराचार्य हैं।
जिस दिन शंकराचार्य जी ने अनशन की घोषणा की थी, उस दिन ऐसा लग रहा था कि यह मामला उलझ जाएगा। लेकिन योगी आदित्यनाथ के मैदान में आते ही शंकराचार्य की लगभग तीन-चौथाई भीड़ कम हो गई। आज भारत में योगी आदित्यनाथ का जितना सम्मान है, उतना शंकराचार्य का नहीं है, क्योंकि आज का हिंदू अपने आपको मुसलमानों और कम्युनिस्टों से असुरक्षित महसूस कर रहा है, और सुरक्षा के प्रश्न पर शंकराचार्य का कोई ठोस योगदान नहीं है।
शंकराचार्य केवल गाय, गंगा और मंदिर—इन तीनों को लेकर अपनी दुकानदारी कर रहे हैं, जबकि यह बात जगजाहिर है कि यदि हिंदू सुरक्षित रहेगा तो गाय, गंगा और मंदिर भी सुरक्षित रहेंगे। यदि हिंदू ही कमजोर हो गया, तो गाय, गंगा और मंदिर हिंदुओं को नहीं बचा पाएंगे। इसलिए महत्व हिंदुत्व का है, हिंदुओं की आबादी का है; गाय, गंगा और मंदिर हिंदुत्व की तुलना में बाद में आते हैं। ये सब प्रतीक हैं, अस्तित्व नहीं।
लेकिन हमारे शंकराचार्य गाय, गंगा और मंदिर के नाम पर दुकानदारी करना चाहते हैं, अस्तित्व की चिंता नहीं करते। यही कारण है कि आज शंकराचार्य की तुलना में मोहन भागवत का अधिक महत्व है। अभी मुक्तेश्वर आनंद जितनी जल्दी हार मानकर चले जाएँ, उतना ही अच्छा होगा।
हम आज भी शंकराचार्य को सम्मान देने को तैयार हैं, उनकी पूजा करने को तैयार हैं, उन्हें भगवान मानने को भी तैयार हैं, लेकिन शंकराचार्य को हिंदुत्व का संरक्षक मानने को तैयार नहीं हैं।
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