भारत की राजनीति इस समय एक विचित्र दिशा में आगे बढ़ रही है।

भारत की राजनीति इस समय एक विचित्र दिशा में आगे बढ़ रही है। विपक्ष के लगभग सभी प्रमुख नेता एक-एक करके राजनीतिक रूप से हाशिए पर जाते दिखाई दे रहे हैं, और इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में राहुल गांधी उभरकर सामने आए हैं।
राजनीतिक घटनाक्रम को देखें तो पहले अरविंद केजरीवाल का प्रभाव कमजोर पड़ा, उसके बाद बिहार में लालू परिवार की राजनीतिक पकड़ ढीली होती चली गई। अखिलेश यादव भी इस बदलते समीकरण में असमंजस की स्थिति में दिखाई देते हैं। ममता बनर्जी के संदर्भ में भी यह संकेत मिल रहे हैं कि भविष्य में उनका सामना भी इसी राजनीतिक रणनीति से हो सकता है। ऐसे में फिलहाल केवल करुणानिधि परिवार ही ऐसा प्रतीत होता है जो इस प्रक्रिया से अछूता है, किंतु आने वाले एक-दो वर्षों में वहाँ भी राजनीतिक दबाव बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
आज यदि भारत की राजनीति में किसी एक व्यक्ति की सबसे अधिक चर्चा हो रही है, तो वह राहुल गांधी हैं। उन्होंने मीडिया को अपने पक्ष में प्रभावी ढंग से साध लिया है, आक्रामक राजनीतिक शैली अपनाई है और लगातार सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में बने रहने में सफल रहे हैं। इसी कारण वे अन्य विपक्षी नेताओं पर बढ़त बनाते हुए स्वयं को विपक्ष के प्रमुख नेता के रूप में स्थापित करते जा रहे हैं।
विपक्ष के किसी भी नेता की स्थिति अब ऐसी नहीं रह गई है कि वह राहुल गांधी को दिशा या सलाह दे सके। यह भी एक व्यापक धारणा है कि राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी की ओर से एक प्रकार का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, और नरेंद्र मोदी के निरंतर विरोध को आधार बनाकर ही वे पूरे विपक्ष में अपनी स्थिति मजबूत करते चले जा रहे हैं।
यह दृश्य भारतीय राजनीति की जटिलता और विडंबना को उजागर करता है कि केवल आक्रामक भाषा, निरंतर उपस्थिति और रणनीतिक विरोध के बल पर एक व्यक्ति विपक्ष का केंद्रीय चेहरा बनता जा रहा है, जबकि शेष विपक्षी नेता, चाहे अनिच्छा से ही सही, उसी धारा में बहने को विवश दिखाई देते हैं।