इसी कारण कई बार बजरंग दल जैसे संगठनों की आक्रामक गतिविधियों पर मैं मौन रहा हूँ, जबकि
मैं किसी भी प्रकार की सांप्रदायिकता के खिलाफ हूँ। मेरा मानना है कि राज्य का संचालन धर्म के आधार पर नहीं होना चाहिए, क्योंकि धर्म व्यक्ति की निजी आस्था और व्यक्तिगत मान्यता का विषय है।
इसके बावजूद, व्यवहार में मैं यह स्वीकार करता हूँ कि ऐसे मामलों में मैं हिंदुओं की अपेक्षा मुसलमानों की सांप्रदायिक प्रवृत्तियों के प्रति अधिक आक्रामक रुख अपनाता रहा हूँ। इसी कारण कई बार बजरंग दल जैसे संगठनों की आक्रामक गतिविधियों पर मैं मौन रहा हूँ, जबकि यदि इसी प्रकार की गतिविधियाँ सांप्रदायिक मुसलमानों द्वारा की जाती हैं तो मैं उनका खुलकर विरोध करता हूँ।
फिर भी उत्तराखंड के कोटद्वार में बजरंग दल के कुछ लोगों द्वारा एक मुसलमान के साथ जिस तरह की दादागिरी की गई, उसे मैं उचित नहीं मानता। उस घटना के दौरान दीपक नामक एक हिंदू युवक ने अन्याय के खिलाफ खुलकर खड़ा होकर बजरंग दल के लोगों का मुकाबला किया। मैं उसके साहस और नैतिक स्पष्टता की प्रशंसा करता हूँ।
मैं सांप्रदायिक मुसलमानों का समर्थक नहीं हूँ, लेकिन मुसलमानों के विरुद्ध जिस प्रकार का विरोध या दबाव बजरंग दल द्वारा अपनाया जा रहा है, वह तरीका भी सही नहीं है। ऐसे तरीकों का समर्थन नहीं किया जा सकता। संभव है कि कुछ परिस्थितियों में चुप रहना मजबूरी हो, लेकिन इस तरह की आक्रामक और अनुचित कार्रवाइयों की निंदा की जानी चाहिए। इसी संदर्भ में मैं दीपक नामक युवक को धन्यवाद देता हूँ।
ईसाई समुदाय के मामलों में भी बजरंग दल के कुछ लोगों की गतिविधियाँ उचित नहीं लगतीं। भले ही मैं इस विषय में सार्वजनिक रूप से मौन रहा हूँ, लेकिन भीतर से मैं यह महसूस करता हूँ कि यह तरीका गलत है और समाज के लिए नुकसानदेह है।
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