लोकतंत्र, लोकप्रियता और राज्य की नियंत्रण नीति

लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य की यह मजबूरी हो जाती है कि वह जनहित की अपेक्षा लोकप्रियता को अधिक महत्व दे। यही कारण है कि राज्य प्रायः अप्रत्यक्ष रूप से कर वसूल करता है और प्रत्यक्ष रूप से सुविधाएँ देता है, क्योंकि उसे लोकप्रियता बनाए रखने की आवश्यकता होती है। लोकतंत्र में आम जनता वोट देकर जिस व्यक्ति को सत्ता देती है, वही शासक बनता है। इसलिए जो व्यक्ति शासक बनना चाहता है, उसे लोकप्रियता का विशेष ध्यान रखना पड़ता है—चाहे उससे वास्तविक जनहित हो या न हो।

तानाशाही व्यवस्था में ऐसी मजबूरी नहीं होती, क्योंकि वहाँ मतदान का महत्व नहीं होता। यही कारण है कि हमारी राजनीति से जुड़े लोग लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के नाटक और प्रदर्शन करते हैं, ताकि लोग उनके साथ जुड़े रहें। यह लोकतंत्र की एक कमजोरी है, और अब तक इसका कोई संतोषजनक समाधान नहीं निकल सका है।

राज्य लोकतांत्रिक तरीके से समाज को नियंत्रित रखने के लिए जिन तरीकों का उपयोग करता है, उनमें एक प्रमुख तरीका यह भी है कि वह मनोवैज्ञानिक प्रचार के माध्यम से समाज में यह धारणा फैलाता है कि समाज से ऊपर राष्ट्र है और समाज से ऊपर धर्म है। जब धर्म और राष्ट्र को समाज से ऊपर स्थापित कर दिया जाता है, तब धीरे-धीरे समाज शब्द की परिभाषा भी बदल दी जाती है। जातियाँ समाज बन जाती हैं, संगठन समाज बन जाते हैं और धार्मिक संस्थाएँ समाज का रूप ले लेती हैं।

इस प्रकार राज्य अपने उद्देश्य में सफल हो जाता है। एक ओर वह समाज को विभिन्न टुकड़ों में विभाजित कर देता है, और दूसरी ओर समाज से ऊपर धर्म और राष्ट्र को स्थापित कर देता है। परिणाम यह होता है कि राष्ट्र की जगह राज्य सर्वोच्च बन जाता है और धर्म की जगह संप्रदाय प्रमुख हो जाते हैं। इससे सामाजिक एकता धीरे-धीरे खंडित हो जाती है।

इस षड्यंत्र को विफल करने के लिए हमें एकजुट होकर प्रयास करना होगा। समस्या निस्संदेह बहुत बड़ी है, लेकिन उसका समाधान भी खोजना ही होगा, क्योंकि प्रचार माध्यमों का सहारा लेकर राज्य इस प्रकार की भ्रांतियाँ लगातार फैलाता रहता है।