राज्य की “बंदर-बिल्ली” नीति और समाज की सच्चाई
9 मार्च, प्रातःकालीन सत्र।
हम समाज में राज्य की वर्तमान भूमिका पर चर्चा कर रहे हैं। राज्य अक्सर समाज में “बिल्लियों के बीच बंदर” जैसी भूमिका निभाता हुआ दिखाई देता है। इस रूपक में बंदर की तीन प्रमुख भूमिकाएँ होती हैं।
पहली भूमिका यह होती है कि बिल्लियों की रोटी कभी बराबर न हो, क्योंकि यदि रोटियाँ बराबर हो जाएँ तो बिल्लियाँ बंदर की आवश्यकता ही समाप्त कर देंगी।
दूसरी भूमिका यह है कि बंदर हमेशा रोटी को बराबर करने का प्रयास करता हुआ दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में वह उसे बराबर करता नहीं है।
तीसरी भूमिका यह होती है कि बंदर हमेशा उस बिल्ली को, जिसकी रोटी छोटी है, यह याद दिलाता रहता है कि बड़ी रोटी वाली बिल्ली ने उसके साथ अन्याय किया है और उसी के कारण उसकी रोटी छोटी है।
इन तीनों भूमिकाओं में बंदर निरंतर सक्रिय रहता है, और बिना कोई वास्तविक काम किए ही उसका पेट भरता रहता है। राज्य की भूमिका भी कई बार इसी प्रकार की प्रतीत होती है। वह लगातार यह दिखाता है कि वह समाज की असमानताओं को दूर करने का प्रयास कर रहा है, लेकिन व्यवहार में असमानताएँ कम होने के बजाय कई बार बढ़ती हुई दिखाई देती हैं।
दूसरी बात यह है कि राज्य अक्सर “गरीबी हटाओ” जैसे नारे देता रहता है, परंतु गरीबी की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाती। तीसरी बात यह है कि राज्य कई बार गरीबों को यह महसूस कराता रहता है कि वे शोषित हैं और अमीर वर्ग उनके शोषक हैं।
इस प्रकार, कुछ आलोचकों के अनुसार राज्य इस प्रक्रिया का उपयोग करके समाज पर अपनी निर्भरता और नियंत्रण बनाए रखता है। इसलिए समाज के लिए आवश्यक है कि वह राज्य की इस भूमिका को समझे और उसके प्रति सजग बना रहे। हम भी समाज में इसी जागरूकता को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
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