अमेरिका, ट्रंप और भारत: संतुलन की कूटनीति वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत की सावधान विदेश नीति

स्वतंत्रता के बाद से India अपनी विदेश नीति मुख्यतः अपने हितों और परिस्थितियों के आधार पर बनाता रहा है। लंबे समय तक, विशेषकर Jawaharlal Nehru और बाद में Indira Gandhi जैसे नेताओं के दौर में, भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता की नीति से प्रभावित रही। उस समय भारत के संबंध Soviet Union, China, Iran और कई अन्य एशियाई तथा विकासशील देशों के साथ घनिष्ठ बने। इसी दौर में भारत ने Cuba जैसे देशों के साथ भी संबंध बनाए रखे। उस समय की नीति का उद्देश्य यह था कि भारत किसी एक शक्ति-गुट पर पूरी तरह निर्भर न रहे।

वर्तमान समय में, जब से Narendra Modi के नेतृत्व में सरकार आई है, तब से भारत की विदेश नीति में कुछ नए झुकाव दिखाई देते हैं। भारत ने लोकतांत्रिक देशों के साथ अपने संबंधों को और मजबूत किया है, विशेषकर United States, यूरोप और अन्य साझेदारों के साथ। फिर भी भारत पूरी तरह किसी एक पक्ष में नहीं गया है, बल्कि संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता दिखाई देता है।

आज की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में भी यही संतुलन दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, अमेरिकी राजनीति में Donald Trump जैसे नेतृत्व की भूमिका को लेकर बहस होती रही है। ऐसे समय में भारत एक सावधान और संतुलित नीति अपनाने की कोशिश करता है—एक ओर अमेरिका और अन्य लोकतांत्रिक देशों के साथ सहयोग बनाए रखना, और दूसरी ओर किसी एक नेता या अल्पकालिक राजनीतिक परिस्थिति के आधार पर अपनी दीर्घकालिक नीति तय न करना।

इसी कारण भारत अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखते हुए भी अन्य लोकतांत्रिक देशों के साथ व्यापक संपर्क और सहयोग बनाए रखने का प्रयास करता है। यह दृष्टिकोण इस विचार पर आधारित है कि किसी भी देश की विदेश नीति दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय होनी चाहिए, न कि किसी एक नेता या अस्थायी राजनीतिक स्थिति के आधार पर।

इस दृष्टि से कई विश्लेषकों का मानना है कि संतुलन, बहुपक्षीय संबंध और दीर्घकालिक रणनीति—ये तीनों तत्व भारत की विदेश नीति के महत्वपूर्ण आधार बने हुए हैं, और आगे भी इन्हीं के आधार पर उसे आगे बढ़ना चाहिए।