भारतीय न्यायपालिका : विचारधारात्मक प्रभाव से स्वतंत्रता की ओर
भारत में स्वतंत्रता के बाद न्यायपालिका में लंबे समय तक साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित लोगों का वर्चस्व माना जाता रहा। पिछले 10–20 वर्षों में धीरे-धीरे इस एकाधिकार में कमी आई है।
वर्तमान मुख्य न्यायाधीश के वक्तव्यों और संकेतों से पहली बार यह संदेश स्पष्ट रूप से सामने आ रहा है कि न्यायपालिका स्वतंत्र है और किसी विशेष विचारधारा से बंधी हुई नहीं है। न्यायपालिका के निर्णय अब जातिवाद से ऊपर उठकर आते दिखाई दे रहे हैं। वह महिला–पुरुष, दलित–सवर्ण, हिंदू–मुस्लिम जैसे भेदों से परे होकर न्याय करने का प्रयास कर रही है।
न्यायपालिका ने जिस साहस के साथ समान नागरिक संहिता के विषय में अपने विचार व्यक्त किए हैं, उसे भी न्यायिक स्वतंत्रता के एक उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। वामपंथी विचारधारा से जुड़े कुछ लोगों में न्यायपालिका को लेकर जो बेचैनी दिखाई दे रही है, वह भी इन परिवर्तनों की ओर संकेत करती है।
वर्तमान परिस्थितियों में न्यायपालिका की दिशा से संतोष व्यक्त किया जा सकता है। यह भी सत्य है कि न्यायपालिका अपनी सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयासरत रहती है, और वर्तमान न्यायपालिका भी इस मामले में पूरी तरह सजग दिखाई देती है। न्यायिक भ्रष्टाचार पर चर्चा के विषय में न्यायपालिका ने जो सक्रियता दिखाई है, वह इसी सावधानी का एक स्पष्ट उदाहरण है।
फिर भी, कुल मिलाकर न्यायपालिका की दिशा सही कही जा सकती है। यदि न्यायपालिका प्रशासनिक और विधायी मामलों में अपने हस्तक्षेप को कुछ कम कर दे, तो स्थिति और भी बेहतर हो सकती है—और इसे सचमुच “सोने में सुहागा” कहा जा सकता है।
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