समान नागरिक संहिता: सामाजिक संतुलन और विवाद समाधान का प्रस्ताव

7 अप्रैल प्रातःकालीन सत्र: समान नागरिक संहिता पर चर्चा।

जिस तरह समाज में हिंदुओं और मुसलमानों को आपस में लड़ाकर कुछ लोग इसका लाभ उठाना चाहते हैं, उसी तरह समाज में महिला और पुरुष को दो वर्ग बनाकर भी कुछ लोग इस टकराव का लाभ उठाना चाहते हैं। यह बात सच है कि हमारी समाज व्यवस्था में महिलाओं के संबंध में कुछ छोटी-मोटी गलतियाँ हुई हैं, लेकिन उन गलतियों को ठीक करने की आवश्यकता थी।

उसकी जगह कुछ महिलाओं ने कुछ धूर्त पुरुषों के साथ मिलकर इन गलतियों का दुरुपयोग करने का प्रयास किया, और ये महिलाएँ वर्तमान समय में पूरे पुरुष समाज को ब्लैकमेल कर रही हैं। इन धूर्त महिलाओं की संख्या कुल दो प्रतिशत से भी कम है, लेकिन ये पूरे समाज को परेशान कर रही हैं।

इन लोगों ने राजनेताओं को अपना बंधक बना लिया है। इन्होंने फिल्म, कला और खेलों में भी हर जगह घुसकर लाभ कमाया है और ब्लैकमेल भी किया है। बड़े-बड़े राजनेता इन महिलाओं के चंगुल में फँसे हुए हैं, और ये महिलाएँ उनसे मनचाहे कानून बनवा रही हैं।

इन धूर्त महिलाओं का विरोध करना भी अब साधारण रूप से सुरक्षित नहीं रहा है। ऐसी स्थिति में इन महिलाओं से पिंड छुड़ाने का एक उपाय समान नागरिक संहिता बताया जा रहा है। यदि समान नागरिक संहिता लागू हो जाए, तो महिला और पुरुष के बीच वर्ग-संघर्ष का खतरा भी कम हो सकता है और इस प्रकार के दुरुपयोग की आशंकाएँ भी घट सकती हैं।

इसलिए महिला-पुरुष के विवाद को समाप्त करने के लिए समान नागरिक संहिता को एक महत्वपूर्ण उपाय के रूप में देखा जा सकता है।