सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक निरंतरता का सच

बिहार में सम्राट वहाँ के मुख्यमंत्री बन गए हैं। तेजस्वी यादव ने भी इस बात पर खुशी जाहिर की है कि राजद में लालू प्रसाद यादव द्वारा प्रशिक्षित व्यक्ति ही भाजपा में जाकर बिहार का मुख्यमंत्री बना है। राहुल गांधी भी बार-बार यह कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और कांग्रेसियों के सहारे ही चल रही है; वहाँ कोई भाजपा के नए लोग नहीं हैं।

यह बात कुछ हद तक सच भी मानी जा सकती है, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी में दो तरह के लोग अधिक दिखते हैं—या तो विपक्षी दलों से आए हुए, अथवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग। भारतीय जनता पार्टी की स्थापना भी श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी, जो पहले कांग्रेस से जुड़े हुए थे।

वर्तमान समय में नरेंद्र मोदी की सरकार जो भी शासन कर रही है, उसके कई तरीके या तो कांग्रेस के समय में शुरू किए गए थे या प्रस्तावित थे; वही कार्य आगे बढ़ाए जा रहे हैं। यह स्वाभाविक है कि आगे आने वाली सरकार भी वर्तमान सरकार के आधार पर ही कार्य करेगी, क्योंकि संविधान वही है, कानून वही हैं, प्रशासनिक मशीनरी वही है और न्यायपालिका की कार्यप्रणाली भी वही है। सिर्फ एक सरकार बदल देने से सब कुछ नहीं बदला जा सकता।

लगभग 90% कार्य पिछली सरकारों के किए हुए ही आगे चलते हैं; केवल 10% नीतियाँ ही बदली जाती हैं। इसलिए जो कांग्रेस के लोग कहते हैं, उसमें भी आंशिक सत्य है कि भारत सरकार काफी हद तक कांग्रेस द्वारा बनाई गई नीतियों पर ही चल रही है। और जो संघ कहता है कि वर्तमान सरकार उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ा रही है, उसमें भी एक प्रकार की सच्चाई है।

मेरे विचार से विपक्ष की खुशियाँ और संघ की आलोचना—दोनों ही स्वाभाविक हैं। लेकिन यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लोकतंत्र में सब कुछ पूरी तरह बदलना संभव नहीं होता; इसे केवल कोई तानाशाही व्यवस्था ही पूरी तरह बदल सकती है। लोकतंत्र की प्रकृति ही निरंतरता और सीमित परिवर्तन की होती है।