नई समाज व्यवस्था में संविधान सभा की आवश्यकता
30 अप्रैल प्रातःकालीन सत्र नई समाज व्यवस्था में हम यह बात साफ करेंगे कि हमारी पूरी राजनीतिक व्यवस्था संविधान से चलती है। तंत्र उस संविधान का संचालन करता है और क्रियान्वयन करता है। यदि तंत्र दोषी होता है और संविधान ठीक है, तब हम समय-समय पर तंत्र को बदल सकते हैं, लेकिन यदि व्यवस्था में संविधान ही दोषी है, तो केवल तंत्र को बदलने से व्यवस्था ठीक नहीं होगी। मैंने यह अनुभव किया है कि वर्तमान भारत में संविधान दोषी है, इसलिए तंत्र गलतियां कर रहा है। तंत्र और संविधान का संतुलन बिगड़ गया है और तंत्र को बार-बार बदलने के बावजूद भी हम अच्छे परिणाम नहीं ला सके हैं। इसलिए नई समाज व्यवस्था में हम एक संविधान सभा का गठन करेंगे, जो वर्तमान संविधान में व्यापक संशोधन का प्रस्ताव करेगी और उसे संवैधानिक तरीके से लागू करने का प्रयास किया जाएगा। हम केवल तंत्र को दोषी मानकर इस व्यवस्था को ठीक नहीं कर सकते, क्योंकि दोष संविधान में है और उसके कारण तंत्र उद्दंड हुआ है। मैं इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका हूं कि सारी समस्या की जड़ संविधान में है और समाधान की शुरुआत भी संविधान संशोधन से ही होनी चाहिए। आज मैंने संविधान के महत्व पर एक पोस्ट लिखी थी और मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि हमें भारतीय संविधान में एक महत्वपूर्ण संशोधन करना है। यह संशोधन यह है कि वर्तमान में संविधान संशोधन के जो असीम अधिकार तंत्र को प्राप्त हैं, उनके साथ एक संविधान सभा का गठन भी अनिवार्य होना चाहिए। संविधान सभा और लोकसभा दोनों की सहमति के बाद ही कोई संशोधन लागू हो सके, क्योंकि नीति-निर्धारण और क्रियान्वयन एक ही संस्था के हाथ में होना अलोकतांत्रिक है। इसलिए हम इस बात पर दृढ़ हैं कि संविधान सभा का गठन आवश्यक है। यह सभा केवल संविधान संशोधन तक सीमित रहेगी और किसी अन्य कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेगी। संविधान सभा और तंत्र दोनों के अधिकार संतुलित और समान होंगे, जिससे व्यवस्था में पारदर्शिता और संतुलन स्थापित किया जा सके।
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