संघ, सावरकरवाद और हिंदुत्व की दिशा पर एक वैचारिक दृष्टिकोण

मैं बचपन से ही सावरकरवादियों को नापसंद करता रहा हूँ, क्योंकि सावरकरवादी विवेकानंद के हिंदुत्व को पसंद नहीं करते थे। सावरकरवादियों के हिंदुत्व, संघ के हिंदुत्व और गांधी के हिंदुत्व में बहुत अंतर था। गांधी धार्मिक समन्वय के पक्षधर थे, संघ हिंदुओं में समन्वय का पक्षधर था और सावरकर अतिवादी हिंदुत्व के पक्षधर थे।

अहिंसा के मामले में भी गांधी अहिंसा के पक्षधर थे, हेडगेवार सुरक्षात्मक हिंसा के पक्षधर थे और सावरकर आक्रामक हिंसा के पक्षधर थे। यही कारण था कि सावरकर की हिंदू महासभा से अलग होकर हेडगेवार जी ने संघ का कार्य प्रारंभ किया।

यह भी बताया जाता है कि हेडगेवार जी भारत को मातृभूमि मानते थे और सावरकर जी पितृभूमि। गांधी के विषय में भी सावरकर और हेडगेवार के बीच बहुत अंतर था। सावरकर स्वतंत्रता आंदोलन के मामलों में गांधी का विरोध करते थे, जबकि हेडगेवार जी इस प्रकार के मामलों में प्रायः चुप रहते थे। इस प्रकार हेडगेवार और सावरकर के बीच दूरियाँ बढ़ती चली गईं।

स्वतंत्रता के बाद मैंने संघ को पसंद किया, सावरकर को नहीं, और आज भी मैं सावरकरवादियों को पूरी तरह नापसंद करता हूँ। संघ की नीतियाँ बिल्कुल ठीक हैं। इतना होने के बाद भी मैं सावरकरवादियों का विरोध नहीं करता, क्योंकि सावरकरवादी इस्लामिक कट्टरवाद के शत्रु हैं और “शत्रु का शत्रु”, परिस्थिति के अनुसार, मित्र होता है। इसलिए हम सावरकरवादियों से कोई टकराव मोल नहीं लेना चाहते।

लेकिन जब मुसलमान अपनी राह सुधार लेंगे, तब हमारी नीतियाँ बदल सकती हैं। संघ ने प्रवीण तोगड़िया से दूरी बनाकर सावरकरवादियों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि हिंदुत्व संघ के नेतृत्व में चलेगा, सावरकरवादियों के नहीं।