गाजियाबाद की घटना और समाज के सामने खड़े कठिन प्रश्न

2 दिन पहले गाजियाबाद में एक ऐसी घटना घटी जिसने सारे मुस्लिम जगत को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है। किसी को यह समझ में नहीं आ रहा है कि इस प्रकार की घटना के पीछे कौन-सा मनोविज्ञान काम कर रहा था।

घटना किसी एक व्यक्ति के द्वारा नहीं की गई है, बल्कि चार-पाँच लोगों ने मिलकर की है। उन लोगों ने त्योहार के दिन अपने हिंदू मित्र की बकरे के समान कुर्बानी दी है। विशेष बात यह है कि इस घटना में एक बुजुर्ग व्यक्ति की जानकारी होने की बात बताई जाती है।

यह घटना उस प्रदेश में घटी है जहाँ योगी आदित्यनाथ की सरकार काम कर रही है और तत्काल दंड देने का प्रावधान है। स्पष्ट है कि वे सब लोग इस घटना का परिणाम भी अच्छी तरह जानते थे।

यह एक गंभीर सवाल है कि इस प्रकार की घटना के पीछे कौन-सा मनोविज्ञान है। इसके पीछे कोई अंधविश्वास नहीं है, इसके पीछे कोई बहादुरी नहीं है, कोई धर्म का संबंध भी नहीं दिखता। अब तक भारत का मुसलमान सिर्फ इस बात से सिर झुका लेता था कि मुसलमान दूसरों को थूककर उन्हें अपवित्र करता था। इस मनोविज्ञान का आज तक कोई मुसलमान उत्तर नहीं दे सका।

इसी तरह इस मनोविज्ञान का भी किसी मुसलमान के पास उत्तर नहीं है कि त्योहार के दिन किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति को धोखा देकर उसकी कुर्बानी दी जाए। मेरा अखिलेश यादव से भी यह निवेदन है कि वह अपने मुस्लिम मित्रों से इस विषय पर जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करें कि थूकने का मनोविज्ञान क्या है और यह कुर्बानी का मनोविज्ञान क्या है।

मेरे कई मुस्लिम मित्र हैं। मेरे सामने भी यह प्रश्न खड़ा हो गया है कि मैं अपने मुस्लिम मित्रों पर पूर्ण विश्वास कैसे करूँ, जब तक वे थूकने का मनोविज्ञान स्पष्ट नहीं कर देते, और जब तक वे 2 दिन पूर्व की घटना के मनोविज्ञान पर कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाते।