कम्युनिस्टों की राजनीतिक चालें: लाभ से अधिक नुकसान की कहानी
मेरे विचार से राजनीति में कम्युनिस्ट सबसे अधिक चालाक माने जाते हैं। वे सबको ठग सकते हैं और उनसे किसी अन्य पक्ष या विपक्ष के राजनेताओं का बच जाना आसान नहीं है।
भारत में इतने लंबे समय के बाद भी, भले ही राजनीतिक सत्ता की दृष्टि से और संगठन की दृष्टि से भी कम्युनिस्ट कमजोर होते जा रहे हैं, लेकिन वैचारिक और प्रचारात्मक स्तर पर अब तक कम्युनिस्ट कमजोर नहीं हुए हैं।
पिछले 6 महीनों में ही भारत के कम्युनिस्टों ने दो ऐसी चालें चलीं, जिनकी काट किसी अन्य के पास नहीं थी। उन्होंने सबसे पहले योजना बनाकर यूजीसी कानून बनवाया और ऐसी तिकड़म की कि नरेंद्र मोदी समेत हम सारे लोग संकट में फंस गए। उसका कोई समाधान निकल नहीं सका और अभी तक उस घाव पर हम लोग मरहम-पट्टी कर रहे हैं।
कुछ समय बाद दोबारा उन लोगों ने एक दांव मारा और उस दांव में एक नई "छिपकली" नामक संस्था खड़ी कर दी। दो-तीन दिनों में ही वह संस्था सारे देश के लिए सिरदर्द बन गई। कम्युनिस्टों ने इस संस्था को खड़ा करके दोहरी चाल चली। एक तरफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को टारगेट किया और दूसरी तरफ भारत सरकार को भी निशाने पर ले लिया।
लेकिन दुर्भाग्य से उनका यह दूसरा दांव उल्टा पड़ गया। पहले यूजीसी वाले दांव में उन्हें कुछ सफलता मिली थी, लेकिन उससे कई गुना अधिक दूसरे दांव में कम्युनिस्टों को नुकसान हो गया। इस "कॉकरोच पार्टी" को खड़ा करने में कम्युनिस्टों का अंदर तक नुकसान हुआ है और वे इस नुकसान की भरपाई नहीं कर पा रहे हैं।
मैं स्पष्ट हूं कि इस दूसरे दांव के असफल होने में भारत की जनता ने साथ दिया। इसमें पक्ष या विपक्ष के राजनेताओं का कोई योगदान नहीं रहा है। कम्युनिस्टों ने ही यह दांव खेला था और कम्युनिस्टों का यह दांव उल्टा पड़ गया।
अब यह बात साफ दिख रही है कि दोनों दांव मिलकर भी कम्युनिस्टों को नुकसान अधिक हुआ है और लाभ कम। नई परिस्थितियों में "आग-आग" चिल्लाने वाले भी अपनी गलती महसूस कर रहे हैं।
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