व्यक्ति, समाज और राज्य का संबंध : व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता
व्यक्ति और समाज—ये दोनों प्राकृतिक इकाइयाँ हैं। दोनों के अपने-अपने मौलिक अधिकार होते हैं। व्यक्ति उद्दंड न हो जाए, इसके नियंत्रण के लिए सरकार की स्थापना की जाती है। इस सरकार का निर्माण समाज करता है और समाज ही उसे नियंत्रित भी करता है; कोई एक व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता।
सरकार एक निश्चित व्यवस्था के आधार पर कार्य करती है, और वह व्यवस्था संविधान से संचालित होती है। संविधान भी अंततः समाज द्वारा ही निर्मित होता है। इस प्रकार व्यक्ति, सरकार और समाज के बीच परस्पर संबंध स्थापित होते हैं। सरकार और समाज—दोनों का प्रभाव व्यक्ति पर पड़ता है, क्योंकि व्यक्तियों का समूह ही समाज बनाता है।
वर्तमान भारत में समाज को अपेक्षाकृत कमजोर कर दिया गया है और अधिकांश कार्य सरकार ने अपने हाथ में ले लिए हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि व्यक्ति के चरित्र में जो गिरावट दिखाई दे रही है, उसका दोष समाज पर नहीं, बल्कि सरकार की व्यवस्था पर अधिक आता है। समाज को लगभग निष्क्रिय बना दिया गया है—न समाज संविधान बना सकता है, न नियम बना सकता है और न ही उन्हें लागू कर सकता है। सब कुछ सरकार के नियंत्रण में चला गया है।
इसलिए यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि व्यक्ति के चरित्र में आई गिरावट तब तक नहीं सुधर सकती, जब तक सरकार का हस्तक्षेप कम नहीं होगा या सरकार की बुराइयाँ दूर नहीं होंगी। जो लोग व्यक्ति के चरित्र-निर्माण के कार्य में निरंतर लगे हुए हैं, वे गलत नहीं कर रहे हैं; उनका कार्य भी चलता रहना चाहिए। परंतु केवल इस प्रयास से व्यापक और स्थायी परिणाम मिल जाएँगे—यह मान लेना उचित नहीं है। इसलिए चरित्र-निर्माण की तुलना में व्यवस्था-परिवर्तन को अधिक महत्व देना आवश्यक है।
मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि चरित्र-निर्माण में लगे लोग यदि व्यवस्था-परिवर्तन के प्रयासों को बाधित करते हैं, तो यह एक गंभीर भूल है। वास्तव में, सुदृढ़ चरित्र-निर्माण के लिए भी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
आज प्रातःकाल मैंने एक पोस्ट लिखी थी, जिसमें राष्ट्र की पहचान के लिए पाँच बिंदुओं का उल्लेख किया था। उस पर कुछ मित्रों ने पाँचवें बिंदु के संबंध में प्रश्न उठाया है। उस बिंदु में मैंने लिखा था कि राष्ट्र की पहचान का एक आधार यह भी है कि उसकी एक संप्रभु और स्वतंत्र समाज व्यवस्था होती है। मित्रों ने इस विषय में कुछ स्पष्टीकरण चाहा है।
मेरा मानना है कि राज्य चार आधारों पर टिका होता है—
-
उसकी एक निश्चित भौगोलिक सीमा होती है,
-
एक जनसंख्या होती है,
-
उसकी संप्रभुता होती है,
-
और एक शासन-व्यवस्था होती है।
लेकिन राज्य के पास अपनी कोई स्वतंत्र या संप्रभु समाज-व्यवस्था नहीं होती। यदि किसी भूभाग में ऐसी समाज-व्यवस्था विकसित हो जाए, जो राज्य के नियंत्रण से मुक्त होकर अपने कार्य स्वयं संचालित कर सके, तो उसे हम राष्ट्र की संपूर्णता के रूप में समझ सकते हैं।
समाज-व्यवस्था का सीधा अर्थ यह है कि उस भूभाग में रहने वाले लोग अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति आपसी सहमति और सहयोग से कर लेते हैं, जिसमें राज्य की भूमिका अत्यंत सीमित या नगण्य होती है। अंग्रेज़ी में इसे “Stateless Society” कहा जाता है और हिंदी में इसे “राज्य-मुक्त समाज व्यवस्था” कहा जा सकता है।
इस प्रकार हम राज्य और राष्ट्र के बीच का अंतर अधिक स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं।
कुछ मित्रों ने यह भी पूछा कि समाज की पहली इकाई क्या मानी जानी चाहिए। मेरे विचार से समाज की पहली इकाई वह होती है, जहाँ एक से अधिक व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों को पूर्णतः व्यक्तिगत न रखकर उन्हें संयुक्त रूप से स्वीकार करते हैं और साझा जीवन-व्यवस्था में सम्मिलित हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में समाज की उस पहली इकाई में अधिकार व्यक्तिगत न रहकर सामूहिक स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं।
Comments