ब्राह्मण उभार, सामाजिक तनाव और राजनीतिक प्राथमिकताएँ

स्वतंत्रता के पूर्व जैसी हमारी समाज व्यवस्था थी, उसके आधार पर यह स्पष्ट है कि उस समय 99% योग्यता स्वर्ण के पास थी और स्वर्ण में भी आधे से अधिक योग्यता ब्राह्मण के पास मानी जाती है।

स्वतंत्रता के बाद स्वर्ण ने मिलकर सरकारी नौकरी और राजनीति को अधिक आकर्षक और शक्तिशाली बना दिया। वह सारा लाभ इन दो तक सीमित करना चाहते थे, लेकिन भीमराव अंबेडकर ने उसमें हस्तक्षेप किया और उस लाभ में कुछ प्रतिशत कम योग्य लोगों को भी मिलने की व्यवस्था कर दी। अंबेडकर के इस षड्यंत्र को स्वर्ण ने चुपचाप स्वीकार कर लिया।

धीरे-धीरे ये अंबेडकरवादी पूरे समाज को ब्लैकमेल करने लगे, लेकिन संवर्ण इन सब बातों को देखते हुए भी इसलिए चुप रहे कि हिंदू एकता की ज्यादा जरूरत है और मुसलमान इसका लाभ उठा सकते हैं। यही सोचकर कुछ मुट्ठी भर अवर्णों की दादागिरी भी स्वर्ण बर्दाश्त करते रहे।

लेकिन पिछले 1 वर्ष से जब यह बात साफ हो गई कि अब नक्सलवाद भी समाप्त हो जाएगा और जल्दी ही मुस्लिम सांप्रदायिकता पर भी नियंत्रण हो जाएगा, तब स्वर्ण में इस बात की छीना-झपटी शुरू हुई कि अब लाभ के अवसर जातिवाद के आधार पर ही मिल सकते हैं।

यही कारण है कि पिछले एक-दो वर्षों से स्वर्ण में जातिवाद की लहर आनी शुरू हुई और जैसा कि मैं पहले लिख चुका हूँ कि स्वर्ण में ब्राह्मणों की योग्यता बहुत अधिक थी, चाहे वह कार्य वैचारिक और विद्वत्तापूर्ण हो या आपराधिक। ब्राह्मण ही पिछले 70 वर्षों तक सबसे अधिक इस जातिवाद का शिकार रहा है। यही कारण है कि वर्तमान समय में भारत में ब्राह्मण ही सबसे अधिक तेज गति से उग्र हो रहा है।

फिर भी मैं ऐसा सोचता हूँ कि भरत तिवारी और बैकुंठपुर की घटना को यदि एक साथ जोड़कर देखा जाए, तो ब्राह्मणों ने मुद्दे चुनने में कहीं न कहीं भूल की है।