जंतर-मंतर आंदोलन: घटती भीड़ और बढ़ते सवाल
जंतर-मंतर पर आंदोलन करने वाले सोनम वांगचुक की जो दुर्दशा हो रही है, वह जगजाहिर हो चुकी है। उन्हें उम्मीद थी कि इस आंदोलन में सरकार दखल देगी, उन्हें फिर से आराम से दो-चार महीने के लिए जेल में खाने-पीने की व्यवस्था कर दी जाएगी, लेकिन इस बार सरकार तिलचट्टों की भी पूरी ताकत देख रही है और सोनम वांगचुक भी देख रहे हैं।
कल सोनम वांगचुक ने मंच से तिलचट्टों को बहुत फटकार लगाई कि तुम लोग यहाँ रोज खाने के लिए चले आते हो। एक दिन भी भूखे नहीं रह सकते हो। मुफ्त का खाने के लिए आना अलग बात है और आंदोलन करना अलग बात है।
इसी तरह अन्य नेताओं ने भी अपने लोगों को सलाह दी कि आप लोग घर बैठे कम-से-कम एक-एक दिन की भूख हड़ताल करिए।
मैंने कल यह भी देखा कि वहाँ अब प्रशांत भूषण, संजय सिंह तथा अन्य सभी असफल नेता खानापूर्ति के लिए सिर्फ भाषण देने जा रहे हैं। न उनके साथ कोई लोग हैं, न इनका कोई प्रभाव है, लेकिन अपनी उपस्थिति दर्ज कराना इनके लिए जरूरी है, क्योंकि कंगाल को तो कोई एक आदमी भी दिख जाए, वह भगवान दिखता है।
प्रशांत भूषण सरीखे व्यक्ति की यह दुर्दशा वास्तव में देखने योग्य है। सोनम वांगचुक लगातार इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कोई आए और उन्हें अनशन तोड़ने के लिए निवेदन करे। कॉकरोच पार्टी के नेता भी लगातार देख रहे हैं कि उनकी गिनती घटती जा रही है, लेकिन अभी किसी चमत्कार की उम्मीद में बैठे हुए हैं।
अब सोनम वांगचुक और कॉकरोच पार्टी के नेताओं को यह विश्वास कर लेना चाहिए कि धीरे-धीरे भारत की जनता समझदार हो रही है।
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