क्या वर्तमान न्यायपालिका पर जनता का विश्वास घट रहा है?

भारत में यह बात लंबे समय से अनुभव की जा रही है कि न्यायपालिका न्याय देने में असफल हो गई है। पिछले 5-10 वर्षों से तो यह बात बिल्कुल साफ हो गई है और प्रत्यक्ष और तत्काल न्याय को न्यायालय की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस धारणा का नेतृत्व कर रहे हैं। वैसे गुजरात में नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी इसका प्रयोग कर चुके हैं। इसके पहले भागलपुर में भी पुलिस वालों ने कुछ लोगों की आँखें फोड़ दी थीं। उसे भी बहुत समर्थन मिला था, लेकिन वर्तमान समय में न्यायपालिका से हटकर प्रत्यक्ष और तत्काल न्याय का जो उदाहरण देश की जनता पसंद कर रही है, वह एक गंभीर सवाल खड़े कर रही है। जनता उस न्यायिक प्रक्रिया से सहमत नहीं है, जिस प्रक्रिया पर हमारी न्यायपालिका चल रही है। अब तो धीरे-धीरे ऐसा लग रहा है कि जब तक न्याय व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव नहीं होता, तब तक न्यायालय को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि तत्काल और प्रत्यक्ष न्याय प्रणाली, जिसमें कार्यपालिका की भूमिका अधिक होती है, वह अधिक लोकप्रिय होती जा रही है। यद्यपि वर्तमान प्रत्यक्ष और तत्काल न्याय प्रणाली आदर्श नहीं मानी जा सकती, लेकिन इसके समाधान के लिए हमें न्यायिक प्रक्रिया ही बदलनी पड़ेगी। हम वर्तमान न्यायिक प्रक्रिया को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं।