जनजागरण में विचार बनाम नाटकबाज़ी

13 जुलाई प्रातःकालीन सत्र। पूरी दुनिया में और विशेषकर भारत में यह प्रवृत्ति अब तक बढ़ रही है कि जनजागरण के लिए तर्क या विचार-प्रचार का कोई महत्व नहीं रह गया है। अब तो जनजागरण के लिए कलात्मक अथवा प्रचारात्मक माध्यम ही एकमात्र साधन है। इसी प्रवृत्ति को देखते हुए अनेक तरह के तरीके अपनाए जा रहे हैं, चाहे वह संसद हो, जंतर-मंतर हो या अन्य स्थान हो। कोई जनजागरण के लिए मुंडन करा रहा है, कोई नदी के पानी में बैठ जा रहा है, कोई अनशन कर रहा है, कोई नारे लगा रहा है, कोई जेल जाने की कोशिश कर रहा है, कोई दूसरों को गालियाँ दे रहा है। कोई भी ऐसा तरीका अपनाया जा रहा है, जिस तरीके से वह मीडिया में हाईलाइट हो जाए, और मीडिया का सहारा लेते ही वह व्यक्ति लोकप्रिय हो जाएगा तथा लोकप्रिय होते ही वह जीवन में सफल हो जाएगा।

इस प्रवृत्ति को रोकना भी बहुत आवश्यक है और रोकना बहुत कठिन भी है। हम लोग इस प्रवृत्ति को रोकने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम एक नया विकल्प देने का प्रयास कर रहे हैं। जिस विकल्प में कोई नाटकबाज़ी न हो, जिसमें मीडिया को आकर्षित करने के लिए कोई शॉर्टकट न हो। विचारों के आधार पर व्यक्ति आगे बढ़े, विचारों के आधार पर ही जनजागरण हो। इस तरह का अभिनव प्रयास हम लोग कर चुके हैं और धीरे-धीरे इस प्रयास में सफलता भी मिल रही है।

हमें पूरा विश्वास है कि हम नाटकबाज़ी के प्रभाव को सीमित करने में सफल हो जाएंगे। हम विकल्प देंगे, विरोध नहीं।